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सॉंई टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा म0प्र0 सीपीसीटी न्‍यू बैच प्रारंभ संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नं. 9098909565

created Thursday March 26, 09:14 by renuka masram


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जब तक आप में कुछ बनने की अभिलाषा नहीं जागती, तब तक आप हाथ पर हाथ धरे बैठे अपने सपनों के महल को चकनाचूर करते रहेंगे। अगर आपको प्रगति के पथ पर आगे बढ़ना है तो अपने अन्‍दर आशाओं का संचार कीजिए, अपनी अभिलाषाओं को जगाइए, और प्रगति पथ पर आगे बढ़ते चले जाइए। एक किसान ने अपना बेटा अपने एक व्‍यवसायी दोस्‍त की दुकान पर काम पर लगा दिया था। एक दिन वह अपने बेटे की प्रगति के विषय में पूछने के लिए अपने मित्र के पास पहुंचा और उससे पूछने लगा- मिस्‍टर डॉसन! मेरा बेटा कैसा चल रहा हैं? क्‍या वह व्‍यापारी बनने के योग्‍य हो गया है? उसके दोस्‍त ने बताया- मित्र देखो बुरा मत मानना मैं तुम्‍हें ठेस नहीं पहुंचाना चाहता। मगर मुझे स्‍पष्‍ट कहने की आदत है। तुम्‍हारा बेटा हार्डी बहुत होनहार बच्‍चा है। सदैव काम में लगा रहता है, लेकिन मेरी दुकान पर लगे रहने से वह व्‍यापारी नहीं बन सकता। व्‍यवसाय के लिए धन की आवश्‍यकता होती है। मेरा कहना मानो तो इसे खेती का ही कार्य सिखाओ, जिससे कि यह कुछ धन अर्जित कर सके। यदि उस किसान का बेटा उस दुकान पर कार्य करता रहता तो वह कभी भी सर्वश्रेष्‍ठ व्‍यापारी नहीं बनता। खेती-बाड़ी करके थोड़ा धन अर्जित करके जब वह अपने देश से दूसरे देश में पहुंचा तो उसने वहां गरीबों को धनवान बनते देखा। जिन्‍होंने अपने कठोर परिश्रम से यह मंजिल पाई थी, उन्‍हें देखकर उसकी आशाएं और उमंगें जाग्रत हो उठीं। उसने मन में सोचा- जब और लोग परिश्रम के द्वारा उन्नति कर सकते हैं तो मैं क्‍यों नहीं कर सकता। यह बात सत्‍य है कि उस किसान के बेटे में भी व्‍यापारी बनने के सभी गुण विद्यमान थे, परन्‍तु परिस्थिति के बदलते रूप ने उसकी इस योग्‍यता को दबा दिया था।  
मन को उत्तेजित करने वाले वातावरण ने उसकी छुपी हुई शक्तियों को बाहर निकालने में सहायता की, जिससे उसकी योग्‍यता में निखार गया। यदि वह दूसरे देश में जाकर वहां का उन्नतिपूर्ण वातावरण देखता, तो वह इतनी तीव्र गति से उन्नति नहीं कर सकता था। अनुभवों की पाठशाला में अधिक खर्च होता है, परन्‍तु मूर्ख व्‍यक्ति वहां पर भी कुछ विशेष नहीं सीखते, क्‍योंकि वह उपदेश ही दे सकते हैं, चाल-चलन नहीं। जो सलाह-मशविरे से भी कुछ नहीं सीख सकते, उनकी भला कोई क्‍या मदद करेगा? यदि आप बुद्धिमत्तापूर्ण बात ध्‍यान से नहीं सुन सकते तो निश्चित ही आपको ठोकरें खानी पड़ेंगी। कर्त्तव्‍य कर्मों में ऐसा कोई कर्म नहीं, जिसके किए जाने से हजार गुना अधिक लाभ मानव को पहुंचे। ईश्‍वर की सृष्टि में कोई भी उचित कर्म स्‍वार्थ का नहीं, अपितु परमार्थ का ही है। व्‍यापारी प्राय: अपने ही लाभ की बात सोचता है, लेकिन फिर भी उसके काम में कुछ-न-कुछ दूसरे के हित की बात रहती है।  

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