eng
competition

Text Practice Mode

बंसोड टायपिंग इन्‍स्‍टीट्यूट मेन रोड गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा मो0नं0 8982805777

created Feb 24th, 01:23 by bansod typing


1


Rating

306 words
21 completed
00:00
बहुत समय पहले की बात है। एक गांव में एक मूर्तिकार मूर्ति बनाने वाला रहता था।  वह ऐसी मूर्तियां बनता था, जिन्‍हें देख कर हर किसी को मूर्तियों के जीवित होने का भ्रम हो जाता था। आस-पास के सभी गांव में उसकी प्रसिद्धि थी, लोग उसकी मूर्तिकला के कायल थे। इसीलिए उस मूर्तिकार को अपनी कला पर बड़ा घमंड था। जीवन के सफ़र में एक वक्‍त ऐसा भी आया जब उसे लगने लगा की अब उसकी मृत्‍यु  होने वाली है, वह ज्‍यादा समय तक जीवित नहीं रह पाएगा। उसे जब लगा की जल्‍दी ही उसकी मृत्‍यु  होने वाली है तो वह परेशानी में पड़ गया। यमदूतों को भ्रमित करने के लिए उसने एक योजना बनाई। उसने हुबहू अपने जैसी दस मूर्तियां बनाई और खुद उन मूर्तियों के बिच जा कर बेठ गया। यमदूत जब उसे लेने आए तो एक जैसी ग्‍यारह आकृतियों को देखकर दांग रह गए। वे पहचान नहीं कर पा रहे थे की उन मूर्तियों में से असली मनुष्‍य कौन है। वे सोचने लगे अब क्या किया जाए। अगर मूर्तिकार के प्राण नहीं ले सके तो श्रथि का नियम टूट जाएगा और सत्‍य परखने के लिए मूर्तियों को तोड़ा गया तो कला का अपमान हो जाएगा अचानक एक यमदूत को मानव स्‍वभाव के सबसे बड़े दुर्गुण अहंकार को परखने का विचार आया। उसने मूर्तियों को देखते हुए कहा, कितनी सुन्‍दर मूर्तियां बने है, लेकिन मूर्तियों में एक त्रुटी है। काश मूर्ति बनाने वाला मेरे सामने होता, तो में उसे बताता मूर्ति बनाने में क्‍या गलती हुई है। यह सुनकर मूर्तिकार का अहंकार जाग उठा, उसने सोचा मेने अपना पूरा जीवन मूर्तियां बनाने में समर्पित कर दिया भला मेरी मूर्तियों में क्‍या गलती हो सकती है। वह बोल उठा कैसी त्रुटी। झट से यमदूत ने उसे पकड़ लिया और कहा बस यही गलती कर गए तुम अपने अहंकार में, कि बेजान मूर्तियां बोला नहीं करती।

saving score / loading statistics ...