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साँई कम्प्यूटर टायपिंग इंस्टीट्यूट गुलाबरा छिन्दवाड़ा (म0प्र0) संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565
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हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 को एतत्द्वारा इस संविधान अधिनियमित और आत्मार्पित करते है।
उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि उद्देशिका संविधान का अंग नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि उद्देशिका को संविधान का प्रेरणातत्व भले ही कहा जाय, किन्तु उसे संविधान का आवश्यकत भाग नहीं कहा जा सकता है। इसके न रहने से संविधान के मूल उद्देश्यों में कोई अन्तर नहीं पड़ता है। यह न तो सरकार को शक्ति प्रदान करने का स्त्रोत है और न ही उस शक्ति को किसी भी भांति निर्बन्धित, नियंत्रित या संकुचित करती है। केवल तब होता है जब संविधान की भाषा अस्पष्ट या संदिग्ध हो। ऐसी अवस्था में संविधान के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए उद्देशिका का सहारा लिया जा सकता है। जहां संविधान की भाषा असंदिग्ध है।
मामले में उच्चतम न्यायालय ने बेरूबारी के मामले में दिये गये निर्णय को उलट दिया और यह अभिनिर्धारित किया कि संविधान का एक भाग है। किसी साधारण अधिनियम में उतना महत्व नहीं दिया जाता है जितना संविधान में। संविधान के उपबन्धों के निर्वचन में उद्देशिका का बहुत बड़ा महत्व है। मुख्य न्यायमूर्ति श्री सीकरी ने कहा है कि इस मत के पक्ष में कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं प्रस्तुत गया है कि जो शक्तियों के विषय में सही है वही निषेधों और परिसीमाओं के विषय में भी सही है। निहित उदात आदर्शो के अनुरूप निर्वचन किया जाना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि उद्देशिका संविधान का अंग नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि उद्देशिका को संविधान का प्रेरणातत्व भले ही कहा जाय, किन्तु उसे संविधान का आवश्यकत भाग नहीं कहा जा सकता है। इसके न रहने से संविधान के मूल उद्देश्यों में कोई अन्तर नहीं पड़ता है। यह न तो सरकार को शक्ति प्रदान करने का स्त्रोत है और न ही उस शक्ति को किसी भी भांति निर्बन्धित, नियंत्रित या संकुचित करती है। केवल तब होता है जब संविधान की भाषा अस्पष्ट या संदिग्ध हो। ऐसी अवस्था में संविधान के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए उद्देशिका का सहारा लिया जा सकता है। जहां संविधान की भाषा असंदिग्ध है।
मामले में उच्चतम न्यायालय ने बेरूबारी के मामले में दिये गये निर्णय को उलट दिया और यह अभिनिर्धारित किया कि संविधान का एक भाग है। किसी साधारण अधिनियम में उतना महत्व नहीं दिया जाता है जितना संविधान में। संविधान के उपबन्धों के निर्वचन में उद्देशिका का बहुत बड़ा महत्व है। मुख्य न्यायमूर्ति श्री सीकरी ने कहा है कि इस मत के पक्ष में कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं प्रस्तुत गया है कि जो शक्तियों के विषय में सही है वही निषेधों और परिसीमाओं के विषय में भी सही है। निहित उदात आदर्शो के अनुरूप निर्वचन किया जाना चाहिए।
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