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सनातन धर्म UP Police SI/ASI/Computer Operator Hindi Typing

created Today, 02:52 by Yogendra Singh


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इस संसार में दो तरह के रुग्ण व्यक्ति रहते हैं- दूसरों को सताकर सुख लेने वाले और स्वयं को कष्ट देकर सुख पाने वाले। सैडिस्ट या परपीड़क वे लोग हैं, जिन्हें सुख और आनंद दूसरों को सताने में मिलता है, और मैसोचिस्ट यानी आत्मपीड़क वे लोग हैं, जिन्हें खुद को सताने से सुख मिलता है। लेकिन है यह एक जैसी ही हिंसा। परपीड़क चूंकि दूसरों पर हिंसा फेंकते हैं, इसलिए देर-सवेर लोग इसके विरुद्ध विद्रोह करेंगे। लेकिन आत्मदमन के विरुद्ध विद्रोह के लिए कोई होता ही नहीं। वास्तव में, सभी क्रांतिकारी जब सत्ता में आते हैं, तो धीरे-धीरे अपना सम्मान खोने लगते हैं। वे देर-सवेर कुर्सियों से उतार दिए जाते हैं, उनकी सत्ता और शक्ति नष्ट हो जाती है और उन्हें अपराधी समझा जाने लगता है। पूरा इतिहास इन्हीं अपराधियों से बना है। यह मनुष्यता का इतिहास नहीं है, क्योंकि इसमें मानवोचित सहृदयता नहीं है। यह मानवीय सहृदयता का इतिहास होकर सिर्फ राजनीति, राजनीतिक टकरावों, संघर्षों और युद्धों का इतिहास है। जिनके पास जब तक शक्ति और सत्ता है, वे देवताओं की तरह पूजे जाते हैं। लेकिन देर-सवेर उनकी सत्ता समाप्त होती ही है। फिर एक दिन ऐसा आता है, जब हिटलर सम्मानित नहीं रह जाता, उसका नाम गंदा और कुरूप बन जाता है। एक दिन वह आता है, जब स्टालिन भी आदरणीय नहीं रह जाता। ठीक उल्टा हो जाता है। लेकिन जो कल्पित कथाओं की धार्मिक परिकल्पना है, या स्वयं को सताने वाले संन्यासियों की वास्तविकता है, लोग उसे कभी नहीं जान पाते, क्योंकि वे कभी किसी अन्य व्यक्ति को नहीं सताते। वे अपने आप को ही सताते हैं। और लोग उन्हें सम्मान दिए चले जाते हैं। लोग उनका बहुत अधिक आदर करते हैं, क्योंकि वे स्वयं के अतिरक्ति किसी भी व्यक्ति के लिए हानिकारक नहीं हैं। लेकिन ऐसा संन्यास एक तरह की मानसिक रुग्णता हैय यह किसी भी तरह सामान्य नहीं है। बहुत अधिक भोजन करना भी असामान्य असाधारणता है। ठीक मात्रा में भोजन करना ही सामान्य होता है। मध्य में बने रहना ही सामान्य बनता है। ठीक मध्य में बने रहना ही, स्वस्थ, समग्र और धार्मिक बनना है। यदि तुम एक पराकाष्ठा या अति पर जाते हो, तो राजनीतिक बन जाते हो। यदि तुम दूसरी अति पर जाते हो, तो एक कट्टर धार्मिक संन्यासी बन जाते हो। दोनों ने ही संतुलन खो दिया है। इसलिए जिस धर्म का हम यहां आह्वान कर रहे हैं, वह तो स्वपीड़क है और दूसरों को सताने वाला। वह सामान्य है। वह मध्य में है।

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