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TRIVENI TYPING MANSAROVAR COMPLEX CHHINDWARA MOB-7089973746
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लेकर मानुष तें देवता करत न लागी बार में यकीन करती हैं। जिसे जीते जी किसी ने न पूछा, वही अचानक महान की कोटि में पधरा दिया जाता है। जो किसी जमाने में एकदम पैदल लगा करता था, उसे जन्मजात प्रतिभा का धनी सिद्ध कर दिया जाता है कि उसके पांव तो पालने में ही दिखने लगे थे। माता-पिता बताते हैं कि वह जब पैदा हुआ था, तभी कविता में रोया था, पर हिंदी वालों ने कभी उसको उसका देख रेख परिवारी-जन श्रद्धांजलि-सभा में हिंदी वालों को कुछ इस नजर से देखते हैं, मानों हिंदी पर एहसान करते हों मानो उनके उनको स्वर्गीय करने में इन्हीं हिंदी वालों का हाथ हो कि जिस बंदे ने हिंदी साहित्य को अपना सब कुछ दे दिया, उसी ने उनको कुछ नहीं दिया, उल्टे उनकी हमेशा उपेक्षा की। ऐसी ही है अपनी साहित्यिक संस्कृति कि हर लेखक जीते जी जीरो, लेकिन मरते ही हीरो हो जाता है। जीते जी उसकी शिकायतें और मरते ही उसकी महानता की हिमायतें होने लगती हैं- इस खेल में हर श्रद्धेय को देवता बनाने वाला, अपने को भी देवता बना डालता है। श्रद्धांजलि-सभा के ऐसे फायदे देखकर मैं भी सोचने लगा हूं कि जीते जी अपनी विनम्र श्रद्धांजलि क्यों न करा लूं और पंद्रह सेकंड का देवता क्यों न बन जाऊं? किंतु जो अपने प्रत्येक कर्म को ब्रह्म को समर्पित करता है, वही कर्मयोगी है, वही मुक्त होने का अधिकारी है। कई लोग सोचते हैं कि अच्छे कर्मों का फल भोगना तो आनंददायक होता है, परंतु ऐसा नहीं है। सुख की अवस्था में भी मनुष्य अक्सर असावधान होकर नए अधर्म कर बैठता है, जिससे वह पुनः बंधन में पड़ जाता है। इसीलिए ज्ञानी लोग कहते हैं कि व्यक्ति को कर्मों और उनके परिणामों से ऊपर उठना चाहिए। धर्ममय जीवन का सार यही है कि व्यक्ति बुराई से दूर रहे
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