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Malti Computer Center Tikamgarh CPCT

created Saturday January 24, 02:50 by MCC21


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रियाल में भारी गिरावट और बढ़ती महंगाई को लेकर तेहरान के ग्रैंड बाजार में दुकानदारों की स्थानीय हड़ताल से जो शुरू हुआ वह इतनी बड़ी चुनौती में बदल गया है जिसका सामना इस इस्लामी गणराज्य ने साल 1979 में अपनी स्थापना के बाद से कभी नहीं किया है। विरोध प्रदर्शनों के पैमाने और निरंतरता ने गहरे बैठे जन असंतोष को उघाड़ कर सामने रख दिया। लंबे समय से पश्चिमी प्रतिबंधों की मार झेल रहा ईरान गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है जो जून 2025 में इजराइल के बमबारी अभियान के बाद और बुरा रूप ले चुका है। दिसंबर में, सरकार ने ईंधन की कीमतें बढ़ायीं और कुछ खाद्य रियायतों को वापस लिया। आवश्यक वस्तुओं की उछलती कीमतों के साथ इस कदम ने जन आक्रोश भड़का दिया। पिछले हफ्ते विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गये, जिसके बाद क्रूर राज्य दमन शुरू हुआ। अमेरिका और नॉर्वे में अधिकार समूहों ने दावा किया सैकड़ों प्रदर्शनकारी मारे गये हैं, जबकि ईरान के सरकारी मीडिया ने खबर दी कि “दंगाइयों” द्वारा दर्जनों सुरक्षा कर्मी मारे गये। ईरान ने पहले भी अंदरूनी उथल-पुथल झेली है और बार-बार बाहरी आक्रमणों का सामना किया है, जिसमें सबसे ताजा जून में हुआ इजराइली-अमेरिकी हमला है। लेकिन अभी का संकट इस मायने में अलग है कि इसमें घरेलू अशांति चलने के साथ-साथ विदेशी हस्तक्षेप की धमकी, दोनों का मेल है। बार-बार सैन्य हस्तक्षेप करने की धमकी दे चुके अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने, 13 जनवरी को, प्रदर्शनकारियों से ईरान की संस्थाओं पर “कब्जा करने” का अनुरोध किया और कहा कि “मदद चल पड़ी है”। ईरान की राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली लंबी टिकने वाली नहीं है। बार-बार विरोध प्रदर्शनों ने ढांचागत कमजोरियों को सामने ला दिया है, जबकि राज्य ने जनता के गिले-शिकवे दूर करने में कोई सक्षमता नहीं दिखायी है। लेकिन एक और बमबारी अभियान हल नहीं है। ईरान के हुक्मरान दबाव में हैं, लेकिन यह मान लेना गलत है कि वे अंदरूनी तौर पर अलग-थलग पड़ गये हैं। साल 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में लगभग 3 करोड़, कुल निर्वाचकों के तकरीबन 50 फीसदी लोगों, ने वोट डाले। बीते 12 जनवरी को, सरकार-समर्थक रैलियों में हजारों ईरानी सड़कों पर उतरे। इजराइली बमबारी, लगातार विरोध-प्रदर्शनों और ट्रम्प की धमकियों के बावजूद, सुरक्षा तंत्र की वफादारी में कोई दरार नहीं दिख रही। जबरन हुकूमत बदलने के मकसद से अमेरिकी हमला इस क्षेत्र को और गहरी अराजकता में डुबोने या ईरान को हिंसा के लंबे चक्र में धकेलने का खतरा पैदा करेगा। धर्मतंत्र के अत्याचार से “मुक्ति” के बजाय, युद्ध लोगों के लिए और तकलीफें लेकर आयेगा। अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में अमेरिकी आक्रमणों की थोड़ी भी समझ रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि युद्ध से आंतरिक राजनीतिक संकट हल नहीं होते। फिर भी, अमेरिका यह बदनाम और खतरनाक रास्ता दोहराने को तैयार लगता है। ईरान की भलाई के बारे में सचमुच चिंतित लोगों को इसके बजाय वहां के हुक्मरानों से बातचीत के लिए दबाव बनाना चाहिए और सार्थक सुधारों को प्रोत्साहित करना चाहिए। ईरान को अपने आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संकटों के निवारण की दिशा में बढ़ने के लिए त्वरित भरोसेमंद बदलाव की जरूरत है, और यह काम तेहरान विदेशी सहयोग से ही शुरू कर सकता है कि एक और साम्राज्यवादी युद्ध से।
 
 

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