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Malti Computer Center Tikamgarh MP ASI Steno
created Jan 24th, 02:43 by Ram999
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विद्यार्थियों के आत्महत्या से जुड़े अभी जारी एक मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को नौ निर्देश जारी किये हैं। निजीकरण के जरिए उच्च शिक्षा का विस्तार गुणवत्ता में समानुपातिक वृद्धि के बगैर होने की बात मानते हुए, अदालत ने विद्यार्थियों की वित्तीय, सामाजिक, सामाजिक न्याय और अकादमिक मुद्दों से संबंधित परेशानियों पर गौर किया है। उसने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया है और नौ में से सात निर्देश उच्च शिक्षण संस्थाओं में आत्महत्याओं का अलग से रिकॉर्ड रखने, रिपोर्ट करने और नजर रखने से संबंधित हैं। दो निर्देशों में रजिस्ट्रारों और कुलपतियों (वीसी) के साथ-साथ सभी खाली फैकल्टी पदों को भरने का आदेश दिया गया है। साफ तौर पर, सुप्रीम कोर्ट इन कदमों को विद्यार्थियों के कुशल-मंगल के लिए बेहद अहम मानता है। देश भर में, जमीनी पत्रकारीय-रिपोर्टों से पता चलता है कि कई सरकारी उच्च शिक्षण संस्थाओं, खासकर विश्वविद्यालयों में 50 फीसदी पद खाली हैं। मद्रास विश्वविद्यालय एक केस स्टडी है क्योंकि यह तमिलनाडु में - वह राज्य जो उच्च शिक्षा में नामांकन के मामले में राष्ट्र में अग्रणी है और महिला शिक्षा में शानदार रिकॉर्ड रखता है - सर्वोत्तम राज्य-प्रशासित उच्च शिक्षण संस्था है। गौरवशाली विरासत वाला यह विश्वविद्यालय परीक्षाओं के जरिए संबद्ध कॉलेजों में डिग्री प्रदान करने के अलावा गुणवत्तापूर्ण शोध के लिए जाना जाता था। 1970 के दशक के आखिर में, विश्वविद्यालय में अध्यापन महत्वपूर्ण घटक बन गया, लेकिन पिछले दशक में, इसमें गिरावट साफ दिखने लगी है। कोई नयी फैकल्टी नियुक्ति नहीं की गयी है और अध्यापकों की संख्या मंजूरी-प्राप्त संख्या की आधी है। विश्वविद्यालय के शोध घटक की बात करें तो यह बस कामचलाऊ है। यह दर्शनशास्त्र, वनस्पति विज्ञान और गणित जैसे विषयों में उन्नत अध्ययन केंद्र होने का दम भरता है, लेकिन ये वास्तव में जो हुआ करते थे अब उसकी छाया भर रह गये हैं। आज तमिलनाडु पर केंद्रित मानविकी, विज्ञान-आधारित और सामाजिक विज्ञान शोध कार्यों को उपेक्षित कर दिया गया है, जबकि सरकार अपने सरकारी विश्वविद्यालयों के जरिए इनसे फायदा उठा सकती है। कुलपतियों की नियुक्ति असहयोगी राज्यपाल ने रोक रखी है। कुलपतियों के खाली पद तुरंत भरे जा सकें, इससे पहले उस अस्पष्टता को दूर करने की जरूरत हो सकती है जो राज्यपाल की शक्तियों को लेकर राष्ट्रपतीय संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट ने पैदा की है। फैकल्टी पदों को भरने के लिए यूजीसी प्रक्रिया का पालन करना होगा जिसमें कम-से-कम छह महीने लगते हैं और एक बजटीय प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है जिसकी व्यवस्था केंद्र सरकार की मदद से हो सकती है। योग्य फैकल्टी की उपलब्धता एक बाधा हो सकती है। भ्रष्टाचार और राजनीतिक-विचारधारा से जुड़ी नियुक्तियों ने गुणवत्ता को प्रभावित किया है और इसका निवारण करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशित चार-महीने की समयसीमा दुष्कर लग सकती है, लेकिन विकसित भारत जैसे लक्ष्यों की गंभीरतापूर्वक आकांक्षा की जा सके उससे पहले यह आदेश एक मजबूत सरकारी उच्च शिक्षा प्रणाली की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए कार्रवाई का आह्वान है।
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