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TRIVENI TYPING MANSAROVAR COMPLEX CHHINDWARA MOB-7089973746

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भाजपा को अगर अकेले देखा जाए, तो यह उसकी बड़ी रणनीतिक जीत है। बिहार में एनडीए गठबंधन या क्षेत्रीय दलों को जिस तरह से भाजपा के रणनीतिकारों ने बल दिया है, वह गौरतलब है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व पर बिहार में जो सियासी तीर चलाए जा रहे थे, उनमें से ज्यादातर तीरों को नाकाम करके ही यह बड़ी जीत हासिल हुई है। इस चुनावी वर्ष की शुरुआत में ही एनडीए ने महसूस कर लिया था कि कुछ बड़े काम फौरी राहत के बगैर चुनावी नैया ठीक से पार नहीं लगेगी, तो वृद्धा पेंशन में वृद्धि, बिजली बिल माफी, जीविका योजना विस्तार जैसे कदम तत्काल उठाए गए, जो आज बहुत कारगर दिख रहे हैं। सीटों के लिहाज से दूसरे स्थान पर जद-यू का रहना रेखांकित करने योग्य है। कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बीतता हुआ वक्त माना जा रहा था, उनकी पार्टी भी इतनी कमजोर दिख रही थी कि उसे 25 सीटों तक सिमटा हुआ मानकर समीक्षाएं शुरू हो गई थीं। इस सत्तारूढ़ दल को लंबे समय से अपेक्षाकृत बेहतर सुशासन देने का जो फायदा मिला है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जद-यू एक ऐसी पार्टी है, जिसने बगैर बड़बोलेपन के अपनी बुनियाद को केवल बनाए रखा, बल्कि समय के साथ मजबूत भी किया है। नतीजों में भाजपा जितनी मजबूत दिख रही है, लगभग उतनी ही मजबूत जद-यू भी है, इसलिए श्रेय इन दोनों दलों के परस्पर समन्वय को देना चाहिए। बिहार की इस जीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम-काम अव्वल आया है। साथ ही, अमित शाह और धर्मेंद्र प्रधान को भी बेहतर रणनीति संयोजन के लिए याद किया जाएगा। इसके अलावा एनडीए में खास तौर पर चिराग पासवान की पार्टी का प्रदर्शन देखने लायक है। एनडीए के युवा नेताओं में अग्रणी अनुभवी चिराग के लिए बिहार में आगे

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