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हमीरपुर के बालक

created Yesterday, 13:31 by csc ichauli


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बच्चों की सुरक्षा केवल एक पारिवारिक चिंता नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। आधुनिक जीवन की तेज़ रफ्तार में बच्चे घर से स्कूल और स्कूल से घर तक निरंतर यात्रा करते हैं, जहाँ उन्हें अनेक अनुभव मिलते हैं, परंतु साथ ही कई संभावित खतरे भी मौजूद रहते हैं। दुर्घटनाएँ, अपहरण, स्वास्थ्य संबंधी जोखिम और मानसिक दबाव बच्चों की सुरक्षा को चुनौती देते हैं। जब बच्चा सुरक्षित वातावरण में रहता है, तभी उसका शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास संतुलित रूप से हो पाता है। सुरक्षा का भाव बच्चों में आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और सकारात्मक सोच को जन्म देता है। इसलिए बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का नैतिक दायित्व है। नवपीढ़ी के जीवन में निश्चिंतता और संरक्षण का भाव किसी भी सभ्य व्यवस्था की पहचान होता है। समाज की दिशा इस बात से तय होती है कि वह अपने नौनिहालों के लिए कैसा परिवेश रचता है। बदलती जीवनशैली, बढ़ती व्यस्तता और निरंतर गतिशीलता ने बाल्यावस्था को पहले की तुलना में अधिक संवेदनशील बना दिया है। ऐसे में संरक्षण केवल निगरानी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समझ, संवेदना और दूरदृष्टि की माँग करता है। जब परिवेश भरोसे से भरा होता है, तब बालमन खुलकर सीखता, प्रश्न करता और आगे बढ़ने का साहस जुटाता है। यही आधार भविष्य की सशक्त, सजग और जिम्मेदार पीढ़ी का निर्माण करता है। घर से स्कूल तक की यात्रा बच्चों के लिए प्रतिदिन

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