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साँई कम्प्यूटर टायपिंग इंस्टीट्यूट गुलाबरा छिन्दवाड़ा (म0प्र0) संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565
created Yesterday, 09:39 by lovelesh shrivatri
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महामारी के बाद दुनिया की आर्थिक गति और चाल-ढाल दोनों में तेज बदलाव आया है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अस्थिरता, बढ़ती महंगाई, डिजिटल बाजारों का विस्तार और उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रसार ने लोगों के खर्च करने की प्रवृत्ति को बढ़ाया है। इसका सबसे बड़ा असर घरेलू बचत पर पड़ा है। भारत सहित कई देशों में घरेलू बचत दरें ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। उपभोग बढ़ रहा है, लेकिन भविष्य की सुरक्षा के लिए जरूरी बचत घटती जा रही है। यह प्रवृत्ति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चिंता का विषय भी है।
भारतीय परंपरा में बचत को सदगुण माना गया है। यहां कहा जाता है आज की बचत, कल का संबल। गृहस्थ जीवन में संतुलन, संयम और संचय को महत्व दिया गया है। बच्चों की गुल्लक, अनाज के कोठार, गहनों के रूप में सुरक्षित धन और त्योहारों पर सीमित खर्च ये सब हमारे जीवन के अभिन्न अंग रहे है। भारतीय परिवार संकट के समय किसी के सामने हाथ फैलाने की बजाय अपनी जमा पूंजी पर भरोसा करता था। हमारी बदलती जीवनशैली और बाजार-प्रेरित संस्कृति ने इस परंपरा को कमजोर कर दिया है। आज जियो की मानसिकता ऑनलाइन खरीदारी, आसान कर्ज और दिखावे की प्रतिस्पर्धा ने युवाओं को अधिक खर्च की ओर मोड़ दिया है। विशेषकर जेन जी पीढी में बचत की दर केवल 10 से 15 प्रतिशत तक सिमट गई है। अनुभवों, ब्रांड और त्वरित संतुष्टि को प्राथमिकता देने से दीर्घकालीन वित्तीय सुरक्षा पीछे छूट रही है। यह स्थिति उस भारतीय सोच से विपरीत है, जिसमें भविष्य की चिंता और संयम को जीवन मूल्य माना गया है। भारतीय दर्शन भी न अति भोग न अति त्याग की सीख देता है। यही सिद्धांत आर्थिक जीवन में भी लागू होता है। उपभोग जरूरी है। क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था गतिशील रहती है, रोजगार सृजन होता है और नवाचार को बढ़ावा मिलता है। खर्च यदि अनियंत्रित हो जाए और बचत उपेक्षित हो जाए, तो व्यक्ति और समाज दोनों असुरक्षित हो जाते है। आज की वैश्विक परिस्थितियां भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु संकट, तकनीकी बदलाव और आर्थिक अनिश्चितता यह संकेत देती है कि बचत और निवेश दोनों अनिवार्य है। यदि भारतीय समाज अपनी बचत संस्कृति से दूर होता गया, तो दीर्घकाल में आर्थिक आत्मनिर्भरता कमजोर पड़ सकती है। युवाओं को वित्तीय साक्षरता के माध्यम से बचत और निवेश का महत्व समझाना होगा।
भारतीय परंपरा में बचत को सदगुण माना गया है। यहां कहा जाता है आज की बचत, कल का संबल। गृहस्थ जीवन में संतुलन, संयम और संचय को महत्व दिया गया है। बच्चों की गुल्लक, अनाज के कोठार, गहनों के रूप में सुरक्षित धन और त्योहारों पर सीमित खर्च ये सब हमारे जीवन के अभिन्न अंग रहे है। भारतीय परिवार संकट के समय किसी के सामने हाथ फैलाने की बजाय अपनी जमा पूंजी पर भरोसा करता था। हमारी बदलती जीवनशैली और बाजार-प्रेरित संस्कृति ने इस परंपरा को कमजोर कर दिया है। आज जियो की मानसिकता ऑनलाइन खरीदारी, आसान कर्ज और दिखावे की प्रतिस्पर्धा ने युवाओं को अधिक खर्च की ओर मोड़ दिया है। विशेषकर जेन जी पीढी में बचत की दर केवल 10 से 15 प्रतिशत तक सिमट गई है। अनुभवों, ब्रांड और त्वरित संतुष्टि को प्राथमिकता देने से दीर्घकालीन वित्तीय सुरक्षा पीछे छूट रही है। यह स्थिति उस भारतीय सोच से विपरीत है, जिसमें भविष्य की चिंता और संयम को जीवन मूल्य माना गया है। भारतीय दर्शन भी न अति भोग न अति त्याग की सीख देता है। यही सिद्धांत आर्थिक जीवन में भी लागू होता है। उपभोग जरूरी है। क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था गतिशील रहती है, रोजगार सृजन होता है और नवाचार को बढ़ावा मिलता है। खर्च यदि अनियंत्रित हो जाए और बचत उपेक्षित हो जाए, तो व्यक्ति और समाज दोनों असुरक्षित हो जाते है। आज की वैश्विक परिस्थितियां भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु संकट, तकनीकी बदलाव और आर्थिक अनिश्चितता यह संकेत देती है कि बचत और निवेश दोनों अनिवार्य है। यदि भारतीय समाज अपनी बचत संस्कृति से दूर होता गया, तो दीर्घकाल में आर्थिक आत्मनिर्भरता कमजोर पड़ सकती है। युवाओं को वित्तीय साक्षरता के माध्यम से बचत और निवेश का महत्व समझाना होगा।
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