Text Practice Mode
TRIVENI TYPING MANSAROVAR COMPLEX CHHINDWARA MOB-7089973746
created Yesterday, 12:33 by sahulokesh
0
426 words
29 completed
0
Rating visible after 3 or more votes
saving score / loading statistics ...
00:00
अन्य घटना से ज्यादा तो देश में बलात्कार, एसिड अटैक और घरेलू हिंसा के पीड़ितों को लगातार व गहन ट्रॉमा केयर की जरूरत पड़ती है। इनमें से कई मामलों में शारीरिक चोट से ज्यादा मानसिक आघात नुकसानदेह होता है, पर अपने देश में इससे निपटने की व्यवस्था कमोबेश नदारद है। साल 2020 की एक रिपोर्ट बताती है कि सड़क हादसों में ही लगभग दो लाख लोगों की जान गई, जिनमें से करीब 45 फीसदी मामलों में चिकित्सकीय सहायता न मिल पाने के कारण मौत हुई। भारत में दूसरे व तीसरे स्तर के शहरों में आपातकालीन और आघात देखभाल संबंधी विषय पर नीति आयोग का एक हालिया अध्ययन बताता है कि यहां भले ही 91 फीसदी अस्पतालों में अपनी एंबुलेंस की व्यवस्था पाई गई, पर सिर्फ 34 फीसदी में प्रशिक्षित नर्स या सहायक थे और कई अस्पतालों में एंबुलेंस पहुंचने से पूर्व आगमन की सूचना देने वाली व्यवस्था का अभाव था। नवंबर, 2024 में ‘सेवलाइफ फाउंडेशन’ ने सुप्रीम कोर्ट में इस बाबत एक याचिका दायर कर केंद्र व राज्य सरकारों से आपातकालीन आघात अधिकार की गारंटी देने की मांग की थी। दिक्कत यह है कि भारत में अस्पतालों, क्लिनिकों व स्वास्थ्य केंद्रों को देखभाल की उनकी सुविधा के स्तर की बुनियाद पर नहीं बांटा गया है। इसके कारण, एंबुलेंस दुर्घटना पीड़ितों को नजदीकी अस्पताल ले जाती हैं, बजाय इसके कि जहां उन्हें जरूरी सुविधा मिल सके। सितंबर, 2022 में टाटा के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री को हादसे के बाद ऐसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर ले जाया गया, जहां दिमागी चोट के इलाज की व्यवस्था नहीं थी। हादसों में जान बचाने के लिए जरूरी यह भी है कि दुर्घटना स्थल पर नागरिकों को प्रशिक्षित किया जाए। कई अन्य घटना से ज्यादा तो देश में बलात्कार, एसिड अटैक और घरेलू हिंसा के पीड़ितों को लगातार व गहन ट्रॉमा केयर की जरूरत पड़ती है। इनमें से कई मामलों में शारीरिक चोट से ज्यादा मानसिक आघात नुकसानदेह होता है, पर अपने देश में इससे निपटने की व्यवस्था कमोबेश नदारद है। साल 2020 की एक रिपोर्ट बताती है कि सड़क हादसों में ही लगभग दो लाख लोगों की जान गई, जिनमें से करीब 45 फीसदी मामलों में चिकित्सकीय सहायता न मिल पाने के कारण मौत हुई। भारत में दूसरे व तीसरे स्तर के शहरों में आपातकालीन और आघात देखभाल संबंधी विषय पर नीति आयोग का एक हालिया अध्ययन बताता है कि यहां भले ही 91 फीसदी अस्पतालों में अपनी एंबुलेंस की व्यवस्था पाई गई, पर सिर्फ 34 फीसदी में प्रशिक्षित नर्स या सहायक थे और कई अस्पतालों में एंबुलेंस पहुंचने से पूर्व आगमन की सूचना देने वाली व्यवस्था का अभाव था।
saving score / loading statistics ...