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साँई कम्प्यूटर टायपिंग इंस्टीट्यूट गुलाबरा छिन्दवाड़ा (म0प्र0) संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565
created Yesterday, 10:50 by lucky shrivatri
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मध्यप्रदेश में पानी अब सिर्फ प्यास बुझाने का साधन नहीं रहा, बल्कि कई इलाकों में यह बीमारियों का स्त्रोत बनता जा रहा है। विडंबना यह है कि जिस हर घर जल के सपने को सरकार ने विकास की उपलब्धि के रूप में पेश किया, उसी पानी की गुणवत्ता आज आम नागरिक की सेहत पर भारी पड़ रही है। इंदौर में डेढ़ दर्जन से अधिक लोगों की मौत और हजारों लोगों के बीमार होने से यह मामला सतह पर आ गया। यह स्थिति किसी एक गांव या जिले तक सीमित नहीं, बल्कि प्रदेश के शहरी ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में चिंता का कारण बन चुकी है। राज्य के कई हिस्सों से लगातार शिकायतें सामने आ रही है कहीं नलों से मटमैला पानी आ रहा है, कहीं बदबूदार, तो कहीं फ्लोराइड, आयरन और नाइट्रेट की मात्रा तय मानकों से कहीं ज्यादा है। इसका सीधा असर बच्चों, गर्भरती महिलाओं और बुजुर्गो की सेहत पर पड़ रहा है। दस्त, पीलिया, त्वचा रोग और हड्डियों से जुड़ी बीमारियां आम होती जा रही है। सवाल यह नहीं है कि समस्या क्या है सवाल यह है कि जिम्मेदार कौन है? सरकारी विभागों में जिम्मेदारी लेने की नैतिकता ही नहीं है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग नगर निगम और पंचायतें सब अपने-अपने स्तर पर जिम्मेदारी से बचते नजर आते है। पानी की सप्लाई तो शुरू कर दी जाती है, लेकिन उसकी नियमित जांच, शुद्धिकरण और निगरानी पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता।
जब किसी इलाके में बीमारी फैलती है, प्रशासन केवल तभी सक्रिय होता है। पानी के नमूने लिए जाते है, नोटिस जारी होते है और कुछ दिनों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कर दी जाती है। लेकिन जैसे ही मामला सुर्खियों से बाहर जाता है, हालात फिर वही ढाक के तीन पात जैसे हो जाते है।
जब किसी इलाके में बीमारी फैलती है, प्रशासन केवल तभी सक्रिय होता है। पानी के नमूने लिए जाते है, नोटिस जारी होते है और कुछ दिनों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कर दी जाती है। लेकिन जैसे ही मामला सुर्खियों से बाहर जाता है, हालात फिर वही ढाक के तीन पात जैसे हो जाते है।
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