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CPCT CENTER जिला पंचायत उमरिया (म.प्र.) संपर्क:- 9301406862
created Yesterday, 10:57 by R PATEL
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एक झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना पें पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गॉंव अंधकार में लय हो गया था। घीसू ने कहा- ''मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।''
माधव चिढ़कर बोला- मरना ही है तो जल्द मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?
तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!
तो मुझसे तो उसका तड़पना ओर हाथ-पॉंव पटकना नहीं देखा जाता है।
चमारों का कुनबा था और सारे गॉंव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मजदूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम रकने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाकें हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकडि़यॉं तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गॉंव में काम की कमी न थी। किसानों का गॉव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थ। मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलतो, जब दो आदमियों से एक काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनों साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढॉंके हुए जिए जाते थे। संसार की चिताओं से मुक्त कर्ज़ से लदे हुए। गालियॉं भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई गम नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज दे देते थे। मटर, आलू की फसल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भूनकर खा लेते या दस-पॉंच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। कोई कार्य करने को बुलाता तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी मॉंगते। वही ओर आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इंतजार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोऍं।
माधव चिढ़कर बोला- मरना ही है तो जल्द मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?
तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!
तो मुझसे तो उसका तड़पना ओर हाथ-पॉंव पटकना नहीं देखा जाता है।
चमारों का कुनबा था और सारे गॉंव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मजदूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम रकने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाकें हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकडि़यॉं तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गॉंव में काम की कमी न थी। किसानों का गॉव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थ। मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलतो, जब दो आदमियों से एक काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनों साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढॉंके हुए जिए जाते थे। संसार की चिताओं से मुक्त कर्ज़ से लदे हुए। गालियॉं भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई गम नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज दे देते थे। मटर, आलू की फसल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भूनकर खा लेते या दस-पॉंच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। कोई कार्य करने को बुलाता तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी मॉंगते। वही ओर आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इंतजार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोऍं।
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