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चंद्रधर गुलेरी शर्मा की एक रचना है:- ''उसने कहा था'' जो कि जीवन में एक बहुत कुछ सिखाती है। आईये जानते हैं:-  
बड़े-बडे़ शहरों के इक्‍के-गाड़ी वाले की ज़बान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बंबूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगावें। जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्‍के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-संबंध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की ऑंखों के होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पेरों की उँगलियों के पैरों को चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्‍लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक ककी सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्‍करदार गलियों में, हर-एक लड्ढी वाले के लिए ठहरकर सब्र का समुद्र उमड़ाकर ''बचो खालसा जी'', ''हटो भााई जी'', ''ठहरना भाई'', ''आने दो लाला जी'' हटो बाछ कहते हुए सफ़ेद फेंटों, खच्‍चारों और बत्‍तकों, गन्‍ने खोमचे और भारे वालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्‍या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को भी हटना पड़े। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती नहीं; पर मीटी छुरी की तरह महीन मार कती है। यदि कोई बुढि़या बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं- हट जा जीणे जोगिए; हट जा करमॉंवालिए; हट जा पुत्‍तां प्‍यारिए; बच जा लंबी वालिए। समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्‍य है, तू भाग्‍यों वाली है, पुत्रों को प्‍यारी है, लंबी उमर तेरे सामने है, तू क्‍यो मेरे पहिए के नीचे आना चाहती है?- बच जा  
ऐसे बंबूकार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दुकान पर मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोनो के लिए दही लेने आया थाा, और यह रसोई के लिए बडि़यॉं। दुकानदार एक परदेसी से गुँथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता था।  
तेरे घर कहाँ हैं?"
"मगरे में और तेरे?"
"माँझे में, यहाँ कहाँ रहती है?"
"अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं"
"मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ, उनका घर गुरु बाज़ार में हैं।

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