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साँई कम्प्यूटर टायपिंग इंस्टीट्यूट गुलाबरा छिन्दवाड़ा (म0प्र0) संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565
created Yesterday, 09:42 by lovelesh shrivatri
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सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की समस्या कोई आज की नहीं है और किसी एक जगह की भी नहीं है। देशभर में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण कर मकान-दुकान खड़े करने के मामले सामने आते रहे है। सड़कों का जाल बिछाने इन्हें चौड़ी करने तथा दूसरी सरकारी परियोजनाओं के लिए जमीन की जरूरत पड़ती रहती है। ऐसी जमीन पर कई लोग अतिक्रमण कर काबिज हुए दिखते हैं। हाउसिंग एंड लैड राइट नेटवर्क नामक संगठन का यह खुलासा चौकाने वाला है कि वर्ष 2017 से 2023 के बीच करीब साढे तीन लाख मकानों को तोड़ने की नौबत आई है। इससे भी बड़ी चिंता यह भी कि अभी करीब एक करोड़ लोगों के घर टूटने के दायरे में है। वजह अतिक्रमण हटाने व विकास परियोजनाओं के लिए जरूरत दोनों ही है।
विकास के लिए कई बार राह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए विध्वंस की कार्रवाई जरूरी हो जाती है। इसके लिए सरकारों की समूचित पुनर्वास योजनाएं भी होती है। लेकिन बड़ा संकट साफ-सुथरी सरकारी जमीन पर भी अतिक्रमण कर हुए निर्माण कार्यो का है जिनमें अधिकांश में रहवास भी होने लगता है। बेघर होने से बड़ा दर्द कोई नहीं हो सकता। यह संकट सीधे तौर पर स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं को भी प्रभावित करने वाला होता है। बच्चे पढ़ाई से वंचित होते है तो महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करने लगती है। ऐसे परिवारों का आर्थिक रूप से टूटना तो तय ही होता है। सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कोई एक दो नहीं होता। जाहिर है जब जिम्मेदार बेखबर होते है तो भू-माफिया की गिद्ध दृष्टि ऐसी जमीनों पर पड़ती है। कई बार गांव कस्बों से पलायन करने वाले परिवार खाली जमीन पर पहले अस्थायी रूप से बसते है और ऐसी ही अनदेखी के चलते धीरे-धीरे वे अपना घर भी बना लेते है। जिम्मेदार तो तब हरकत में आते है जब या तो कोई हादसा होता है या फिर विकास कार्यो के दौर में इन्हें हटाने की जरूरत पड़ती है।
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को सिर्फ प्रशासिक कार्रवाई मानना ही काफी नही। बल्कि सरकारी सिस्टम में जो अतिक्रमण को बढ़ावा देने वाले हो उन पर भी सख्ती की जरूरत है, तब जाकर ही लोग बड़ी संख्या में बेघर होने से बचेगे।
विकास के लिए कई बार राह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए विध्वंस की कार्रवाई जरूरी हो जाती है। इसके लिए सरकारों की समूचित पुनर्वास योजनाएं भी होती है। लेकिन बड़ा संकट साफ-सुथरी सरकारी जमीन पर भी अतिक्रमण कर हुए निर्माण कार्यो का है जिनमें अधिकांश में रहवास भी होने लगता है। बेघर होने से बड़ा दर्द कोई नहीं हो सकता। यह संकट सीधे तौर पर स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं को भी प्रभावित करने वाला होता है। बच्चे पढ़ाई से वंचित होते है तो महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करने लगती है। ऐसे परिवारों का आर्थिक रूप से टूटना तो तय ही होता है। सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कोई एक दो नहीं होता। जाहिर है जब जिम्मेदार बेखबर होते है तो भू-माफिया की गिद्ध दृष्टि ऐसी जमीनों पर पड़ती है। कई बार गांव कस्बों से पलायन करने वाले परिवार खाली जमीन पर पहले अस्थायी रूप से बसते है और ऐसी ही अनदेखी के चलते धीरे-धीरे वे अपना घर भी बना लेते है। जिम्मेदार तो तब हरकत में आते है जब या तो कोई हादसा होता है या फिर विकास कार्यो के दौर में इन्हें हटाने की जरूरत पड़ती है।
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को सिर्फ प्रशासिक कार्रवाई मानना ही काफी नही। बल्कि सरकारी सिस्टम में जो अतिक्रमण को बढ़ावा देने वाले हो उन पर भी सख्ती की जरूरत है, तब जाकर ही लोग बड़ी संख्या में बेघर होने से बचेगे।
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