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श्री बागेश्वर अकेडमी टीकमगढ़ (म.प्र) मों-6232538946 dca, pgdca, cpct (pushpa school ke samne tikamgarh (m.p)
created Tuesday January 06, 11:53 by Nitin tkg
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एक बार फारस देश में घोड़ों का एक व्याबपारी कुछ बेहद उत्तरम नस्लभ के घोड़े लेकर विजय नगर आया। सभी जानते थे कि महाराज कृष्ण्देव राय घोड़ों के उत्तबम पारखी है। उनके उसतबल में चुनी हुई नस्लोंल के उत्ततम घोड़े थे। महाराज ने फारस के व्या पारी द्वारा लाए गए घोड़ों का निरीक्षण किया तो पाया कि वे घोड़े दुर्लभ नस्लउ के हैं। उन्होुनं व्यालपारी से सभी घोड़े खरीद लिए, क्यों्कि वे अपनी घुड़सवारी सेना को और मजबूत वसुसज्जित करना चाहते थे। जब घोड़ों का व्यालपारी चला गया तो महाराज ने अपनी घुड़सवार सेना के चुने हुये सैनिकों को बुलाया और एक-एक घोड़ा देते हुए उसकी अच्छी तरह देखभाल और उसे भलीभांति प्रशिक्षित करने को कहा। साथ ही यह भी कहा कि घोड़ोंके प्रशिक्षण व भोजनादि का सारा खर्च राजकोष वहन करेगा। तेनालीराम को जब पता चला तो वह भी महाराज से पास पहुंचा और एक घोड़ा अपने लिए भी मांगा। उसे भी एक घोड़ा दे दिया। गया तेनालीराम ने घोड़े को घर लाकर अस्तजबल में बांध दिया। लेकिन उसे न जाने क्याय सूझा कि उसने अस्तकबल के सामने की ओर भी दीवार उठवा दी। अब अस्त बल की स्थिति कुछ ऐसी हो गई थी कि न तो वह घोड़ा कहीं बाहर जा सकता था। और न ही कोई उस अस्ततबल में प्रवेश ही कर सकता था। तेनालीराम ने अस्त बल की दीवार में एक छोटी सी खिड़की छुड़बा दी थी, जहां से घोडें को दाना-पानी दिया जा सके। उसी खिड़की से तेनालीराम घोड़े को हरी घास दाना-पानी और घोड़ा भी खिड़की से अपना मुंह बाहर निकालकर उसे मुंह से दबाता और भीतर खींच लेता। घोड़े को पानी भी इसी खिड़की द्वारा पहुंचाया जाता। करीब एक महीने बाद महाराज ने घोड़े की सुध-बुध ली और यह जानने की कोशिश की किस प्रकार उसकी देखभाल व प्रशिक्षण का काम चल रहा है। तब सभी सैनिकों अपने अपने घोड़े लेकर महाराज के सम्मु,ख आ पहुंचे। हृष्ट़–पुष्ट् व भली भांति प्रशिक्षित घोड़ो को देख महाराज बेहद प्रसन्नी हुये।
लेकिन तभी उन्हों ने पायाकि तेनालीराम और उसका घोड़ा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था, इधर-उधर निगाहें दौड़ाते हुये महराज ने पूछा तेनालीराम कहां हैं जाओं उससे कहों कि अपने घोड़े के साथ हमारे समाने जल्दीो पेश हो। एक सैनिक तेनालीराम के घर की ओर दौड़ा और उसे महाराज का संदेश दिया कि जल्दी से जल्दीप घोड़े को लेकर उनके समाने हाजिर हो जाए। लेकिन तेनालीराम अकेला ही चल दिया। उसे अकेला आया देख महाराज बोले तुम्हा रा घोड़ा कहा है आज मैं सभी घोड़ो का मुआयना कर रहा हूं कि उनकी कैसी देखरेख की गई है जाओं अपना घोड़ा लेकर आओ। क्षमा करें महाराज तेनालीराम बोला, आपने मुझे जो दिया वह घोड़ा गुस्सैाल है और अडि़यल है मैं तो उसे अपने साथ यहां लाना चाहता था लेकिन मेंरे लिए यह संभव नहीं हो पाया कहकर तेनालीराम चुप हो गया। यदि ऐसा है तो में कुछ बहादुरी सैनिकों को तुम्हानरे साथ भेज देता हू, जो तुम्हाेरे साथ जाकर घोड़ा ले आएंगे। महाराज ने कहा। नही-नहीं महाराज ऐसा हरगिज न करिएगा। अब तक घोड़ा की देखभाल मैंने की है और मैं ब्राहृाण हूं। इसलिए अच्छा तो यह होगा कि आप किसी पंडित या पुरोहित को घोड़ा लाने के लिए मरे साथ भेजे होठों पर रहस्मोय मुस्कारर लाते हुए तेनालीराम बोला। संयोगवश राजपुरोहित उस दरवार से उपस्थित था। वह राजपरिवार में कुछ पूजा-पाठ कर्मकांड करवाने वहां आया था। सुब्बा शास्त्री नाम था राजपुरोहित का।
क्याथ तुम तेनालीराम के साथ जाकर उसके अस्तकबल से घोड़ा यहां ला सकते हो महाराज ने उससे पूछा तेनालीराम और सुब्बार की निकटता देख सुब्बाह शास्त्री जला-भुना करता था और तेनालीराम को नीचा दिखाने का कोई मौका चूकना नहीं चाहता वह बोला, क्योंी नही महाराज मैं अभी जाकर घोड़े ले आता हूं ऐसे एक घोड़े की तो बात क्यान मैं दस बिगड़ैल-गुस्सै।ल घोड़ों को साथ ला सकता हूं। ठीक है! यदि ऐसा है तो आइए मेरे साथ तेनालीराम बोला। जब सुब्बात शास्त्रीत और तेनालीराम जा रहे थे तो रास्तेा में तेनालीराम बोला शास्त्री जी मैं जानता हूं कि आप विद्वान है और मैं यह भी जानता हूं कि अपने शास्त्र् का अध्या्न भी किया है कुछ ही देर में जब तेनालीराम के घर पहुंचे तो सुब्बाल शास्त्री अपनी लंबी दाढी को उंगलियों से सहलाते हुए अंहकार भरे स्व र में बोला हाथ कंगर और आरसी क्याक आखिर तुम्हेंत मेरी योग्याता पर विश्वा स हो ही गया। लेकिन शास्त्री जी मेरा, घोड़ा कोई साधारण घोड़ा नहीं है इसलिए मेरा कहना मानें तो पहले खिड़की से झांककर देख लें इसके बाद अस्तयबल की दीवार तोड़कर घोड़े को बहार निकालने की सोचना। अपने होठों पर कुटिल मुस्कान लाते हुए बोला तेनालीराम तेनालीराम ने भी जैसे उस दिन सुब्बाव शास्त्री से पुराना हिसाब-किताब चुकता करने की ठान ली थी। इधर जैसे ही सुब्बात
लेकिन तभी उन्हों ने पायाकि तेनालीराम और उसका घोड़ा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था, इधर-उधर निगाहें दौड़ाते हुये महराज ने पूछा तेनालीराम कहां हैं जाओं उससे कहों कि अपने घोड़े के साथ हमारे समाने जल्दीो पेश हो। एक सैनिक तेनालीराम के घर की ओर दौड़ा और उसे महाराज का संदेश दिया कि जल्दी से जल्दीप घोड़े को लेकर उनके समाने हाजिर हो जाए। लेकिन तेनालीराम अकेला ही चल दिया। उसे अकेला आया देख महाराज बोले तुम्हा रा घोड़ा कहा है आज मैं सभी घोड़ो का मुआयना कर रहा हूं कि उनकी कैसी देखरेख की गई है जाओं अपना घोड़ा लेकर आओ। क्षमा करें महाराज तेनालीराम बोला, आपने मुझे जो दिया वह घोड़ा गुस्सैाल है और अडि़यल है मैं तो उसे अपने साथ यहां लाना चाहता था लेकिन मेंरे लिए यह संभव नहीं हो पाया कहकर तेनालीराम चुप हो गया। यदि ऐसा है तो में कुछ बहादुरी सैनिकों को तुम्हानरे साथ भेज देता हू, जो तुम्हाेरे साथ जाकर घोड़ा ले आएंगे। महाराज ने कहा। नही-नहीं महाराज ऐसा हरगिज न करिएगा। अब तक घोड़ा की देखभाल मैंने की है और मैं ब्राहृाण हूं। इसलिए अच्छा तो यह होगा कि आप किसी पंडित या पुरोहित को घोड़ा लाने के लिए मरे साथ भेजे होठों पर रहस्मोय मुस्कारर लाते हुए तेनालीराम बोला। संयोगवश राजपुरोहित उस दरवार से उपस्थित था। वह राजपरिवार में कुछ पूजा-पाठ कर्मकांड करवाने वहां आया था। सुब्बा शास्त्री नाम था राजपुरोहित का।
क्याथ तुम तेनालीराम के साथ जाकर उसके अस्तकबल से घोड़ा यहां ला सकते हो महाराज ने उससे पूछा तेनालीराम और सुब्बार की निकटता देख सुब्बाह शास्त्री जला-भुना करता था और तेनालीराम को नीचा दिखाने का कोई मौका चूकना नहीं चाहता वह बोला, क्योंी नही महाराज मैं अभी जाकर घोड़े ले आता हूं ऐसे एक घोड़े की तो बात क्यान मैं दस बिगड़ैल-गुस्सै।ल घोड़ों को साथ ला सकता हूं। ठीक है! यदि ऐसा है तो आइए मेरे साथ तेनालीराम बोला। जब सुब्बात शास्त्रीत और तेनालीराम जा रहे थे तो रास्तेा में तेनालीराम बोला शास्त्री जी मैं जानता हूं कि आप विद्वान है और मैं यह भी जानता हूं कि अपने शास्त्र् का अध्या्न भी किया है कुछ ही देर में जब तेनालीराम के घर पहुंचे तो सुब्बाल शास्त्री अपनी लंबी दाढी को उंगलियों से सहलाते हुए अंहकार भरे स्व र में बोला हाथ कंगर और आरसी क्याक आखिर तुम्हेंत मेरी योग्याता पर विश्वा स हो ही गया। लेकिन शास्त्री जी मेरा, घोड़ा कोई साधारण घोड़ा नहीं है इसलिए मेरा कहना मानें तो पहले खिड़की से झांककर देख लें इसके बाद अस्तयबल की दीवार तोड़कर घोड़े को बहार निकालने की सोचना। अपने होठों पर कुटिल मुस्कान लाते हुए बोला तेनालीराम तेनालीराम ने भी जैसे उस दिन सुब्बाव शास्त्री से पुराना हिसाब-किताब चुकता करने की ठान ली थी। इधर जैसे ही सुब्बात
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