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बेगमों के राज की शुरुआत खालिदा जिया ने ही साल 1991 में की थी, जिसे अपने ढंग से शेख हसीना ने आगे बढ़ाया। दोनों की कटु प्रतिद्वंद्विता बांग्लादेश के इतिहास का अटूट हिस्सा है। खालिदा जिया के साथ खास बात यह थी कि सैन्य शासन के बाद लोकतांत्रिक ढंग से उनकी ताजपोशी हुई थी। उनके नेतृत्व में ही बांग्लादेश जम्हूरियत की राह पर आगे बढ़ा था। हालांकि, खुद उनकी पृष्ठभूमि फौज वाली थी, क्योंकि उनके पति जियाउर रहमान सैन्य कमांडर और देश के राष्ट्रपति थे। पति की हत्या के बाद खालिदा जिया ने बीएनपी का नेतृत्व पूरी मजबूती के साथ किया और सत्ता में लोकतांत्रिक ढंग से वापसी की। यह एक सुखद पक्ष है कि उनके समय फौज की दखल कुछ कम हुई, मगर दुखद पक्ष यह है कि उनके समय कट्टरपंथियों की ताकत बढ़ी। एक सुखद पहलू यह है कि उन्होंने अपने समय देश में महिला उत्थान के लिए काम किए, पर दुखद पक्ष यह है कि उनके समय बांग्लादेश को दुनिया के भ्रष्ट देशों में गिना गया। खैर, वह लगभग 19 साल से सत्ता से दूर थीं और अब जब उनकी वापसी की पूरी संभावना थी, जब वह भ्रष्टाचार के आरोपों से बरी हो गई थीं, तब उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। बीएनपी के लिए यह दुखद समय है, लेकिन उसे चुनाव में इससे जरूर फायदा होगा। खालिदा जिया की विरासत को संभालने के लिए उनके बेटे और बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान बांग्लादेश पहुंच चुके हैं। उन्होंने अपनी मां को लोकतंत्र की मां करार दिया है, तो आश्चर्य नहीं। इसमें शक नहीं, खालिदा जिया ने अपने जीवन में कई प्रकार के उत्पीड़न का सामना किया। एक मुस्लिम देश में महिला नेता होना और सरकार की कमान संभालना कोई आसान काम नहीं है। कई प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ता है। हर तरह के आरोप बेगमों के राज की शुरुआत खालिदा जिया ने ही साल 1991 में की थी, जिसे अपने ढंग से शेख हसीना ने आगे बढ़ाया। दोनों की कटु प्रतिद्वंद्विता बांग्लादेश के इतिहास का अटूट हिस्सा है। खालिदा जिया के साथ खास बात यह थी कि सैन्य शासन के बाद लोकतांत्रिक ढंग से उनकी ताजपोशी हुई थी। उनके नेतृत्व में ही बांग्लादेश जम्हूरियत की राह पर आगे बढ़ा था। हालांकि, खुद उनकी पृष्ठभूमि फौज वाली थी, क्योंकि उनके पति जियाउर रहमान सैन्य कमांडर और देश के राष्ट्रपति थे। पति की हत्या के बाद खालिदा जिया ने बीएनपी का नेतृत्व पूरी मजबूती के साथ किया और सत्ता में लोकतांत्रिक ढंग से वापसी की। यह एक सुखद पक्ष है कि उनके समय फौज की दखल कुछ कम हुई, मगर दुखद पक्ष यह है कि उनके समय कट्टरपंथियों की ताकत बढ़ी।

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