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साँई कम्‍प्‍यूटर टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा म0प्र0 संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565

created Friday March 28, 07:53 by lovelesh shrivatri


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एक जंगल में करालकेसर नामक शेर रहता था, धूसरक नामक गीदड़ उसका सेवक था, जो उसकी सेवा किया करता था और बदले में शेर द्वारा मारे गए शिकार का अंश भोजन के रूप में प्राप्‍त करता था। एक बार शेर का हाथी से सामना हो गया, दोनों अपने गर्व में चूर थे, बात बड़ी और युद्ध तक पहुँच गई दोनों में युद्ध हुआ, जिसमें हाथी शेर पर हावी रहा उसने शेर को सूंड से पकड़कर उठाया और धरती पर पटक दिया। शेर के शरीर की कई हड्डियॉं टूट गई। शेर बुरी तरह चोटिल हो चुका था। ऐसे में शिकार पर जाना उसके लिए दुष्‍कर था वह दिन भर एक स्‍थान पर बैठा रहता शिकार कर पाने के कारण वो और उसका सेवक गीदड़ दोनों भूखे मरने लगे। एक दिन शेर गीदड़ से बोला यदि इसी तरह चला तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे प्राण पखेरू उड़ जायेंगे इस समस्‍या का कुछ कुछ समाधान निकालना पड़ेगा वनराज, क्‍या करें? आप तो शिकार पर जा नहीं सकते मैं ठहरा आपका सेवक मैं तो आप पर निर्भर हूँ। गीदड़ ने उत्तर दिया, इस स्थिति में मेरा शिकार पर जाना संभव नहीं लेकिन यदि कोई जानवर मेरे निकट गए तो अब भी मुझमें इतनी शक्ति है कि अपने पंजे के एक वार से उसके प्राण हर सकता हूँ। तुम किसी जानवर को बहला-फुसलाकर मुझ तक ले आओ मैं उसे मार डालूंगा और फिर हम दोनों मिलकर उसका मांस खायेंगे। शेर बोला गीदड को शेर की बात जंच गई और वह शिकार की खोज में निकल पड़ा चलते-चलते वह एक गांव में पहुँचा वहॉं उसने एक खेत में लम्‍बकर्ण नामक गधे को चरते हुए देखा उसे देख वह सेाचने लगा कि इस गधे को किसी तरह शेर के पास ले जाऊं तो कई दिनों के भोजन की व्‍यवस्‍था हो जायेगी। वह गधे के पास गया और स्‍वर में मिठास भरकर बोला अरे मित्र क्‍या हाल बना रखा है? पहले कितने हष्‍ट-पुष्‍ट हुआ करते थे, इतने दुबले-पतले कैसे हो गए? लगता है धोबी कुछ ज्‍यादा ही काम ले रहा हैं। गीदड़ ने गधे की दुखती रख पर हाथ रख दिया था गधा दु:खी स्‍वर में बोला सही समझे मित्र मैं बड़ा दु:खी हूँ धोबी मुझसे आवश्‍यकता से अधिक काम लेता है और कुछ गलती हो जाने पर खूब पीटता है ऊपर से खाने को भी कुछ भी देता इधर-उधर चरकर कर किसी तरह मैं अपनी  भूख शांत करता हूँ इसलिए मेरा हाल हो गया हैं। गीदड़ ने मौका की नजाकत समझ ली और कहने लगा मैं तुम्‍हारा दु:ख समझ सकता हूँ। मित्र वैसे तुम चाहो तो मैं तुम्‍हें एक ऐसे स्‍थान पर ले जा सकता हूँ। जहॉं हरी घास का विशाल मैदान है तुम वहॉं जी भर कर घास खा सकते हों, ये तो बहुत अच्‍छी बात कही मित्र किंतु वहॉं जंगली जानवरों का भय होगा प्राणों पर संकट गया तो? मैं यहीं ठीक हूँ। जो भी प्राप्‍त हो रहा हैं, कम से कम सुरक्षित तो हूँ, गधे ने अपनी शंका जताई।  
सिख:- लोभ नहीं करना चाहिए  

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