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साँई कम्प्यूटर टायपिंग इंस्टीट्यूट गुलाबरा छिन्दवाड़ा (म0प्र0) सीपीसीटी न्यू बैच प्रारंभ संचालक- लकी श्रीवात्री मो. नं. 9098909565
created Mar 10th, 04:24 by sandhya shrivatri
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हंसी इंसानी आनंद की सबसे स्वाभाविक और सबसे निश्छल प्रतिक्रियाओं में से एक है। शायद इसीलिए, अथर्ववेद में कहा गया है कि जब आप हंसते है, तो देवता भी आपके साथ हंसते हैं। प्राचीन भारतीय शस्त्रों में हंसाी के कई रूप बताए गए हैं। हंसी का सबसे प्रांजल रूप वह है, जो किसी को वेदना पहुंचाए बिना मुखर हो। मार्क ट्वेन जैसे पाश्चात्य विद्वान कहते थे कि हंसी मानवता को प्रकृति का उपहार है। इस सदी के प्रारंभ में चर्चित रहे हिन्दी के हास्य कति ओम व्यास कहते थे कि मनुष्य और पशु में एक अंतर यह भी है कि मनुष्य हंस सकता हैं, जबकि प्रकृति ने पशु को हंसी के वरदान से वंचित रखा है। हालांकि पशु हंसते नहीं हैं, लेकिन लकड़बग्घे का हंसना हिन्दी साहित्य में एक मुहावरा हो गया है। दरअसल, लकड़बग्घा शिकार के बाद विचित्र सी आवाज करता है, कवियों ने उसे ही लकड़बग्घा का हंसना कहा है और इस तरह लकड़बग्घे का हंसना एक क्रुरता का परिचायक हो गया है। हंसी क्रूरता से भी उद्भासित होती है, लेकिन वह हंसी का विद्रूप रूप है। विद्वानों के अनुसार सबसे पहले पवित्र हंसी वह है, जो सबको आनंदित करें। कुछ विद्वान निर्मल और निश्छल हंसी को परमात्मा की प्रर्थना का स्वरूप मानते हैं, लेकिन तानाशाही पर आमादा शासकों को प्रार्थना ही मंजुर नहीं होती, तो वह उस हंसी को कैसे बर्दाश्त करेंगे, जिसे विसंगतियों और अन्याय के खिलाफ सबसे प्रभावशाली हथियार माना जाता है। याद करिए किस तरह हिरण्यकश्यप नाम के असुर ने अपने राज्य में प्रार्थनाओं पर प्रतिबंध लगा दिया था, हंसी व्यक्ति के आनंद का सबसे उत्तम प्रकटीकरण है, लेकिन यह अपने आसपास की विसंगतियों को अनावृत्त भी करता है और तानाशाहों को यही बात अच्छी नहीं लगती। यों भी तानाशाह वही तो होता है, जो जनता के जीवन के हर सुखद पहलू को अपनी मर्जी से संचालित करना चाहता है। इसलिए हमें ऐसे कई तानाशाहों के बारे में बताता है, जो अपने मनोरंजन को मारकर उसके शव को भाले पर टांक देते थे या अपनी कुंठा को तृप्त करने के लिए निर्दोषों को मारकर उनकी खोपडियों का ढेर लगा देते थे। पिछले दिनों उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन ने भी ऐसा ही किया। उत्तर कोरिया में नागरिकों के हंसने पर 17 दिसबंर से 11 दिन का प्रतिबंध लगा दिया है। सरकारी आदेश तो यह भी कहता है कि 17 दिसंबर से जो 11 दिन का राजकीय शोक होगा, उस शोक की अवधि में नागरिक अपने प्रियजन की मृत्यु होने पर जोर से नहीं रो सकेंगे और इस दौरान यदि किसी की मृत्यु हो गई तो उसकी अंत्येष्टि भी राष्ट्रीय शोक की अवधि बीत जाने पर ही की जा सकेगी। इस दौर में यह समझना मुश्किल है कि आखिर किसी मृत व्यक्ति के अंतिम संस्कार से राष्ट्रीय शोक में किस तरह का खलल होगा, लेकिन तानाशाह मनुष्य के मनोभावों के दमन में ही अपने अहं की तुष्टि तलाशता है।
