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साँई कम्‍प्‍यूटर टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा म0प्र0 संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565

created Sep 23rd, 04:13 by lucky shrivatri


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अगर कोई व्‍यक्ति किसी के साथ साधारण मारपीट करता है, तो ऐसी दशा में पुलिस मामला दर्ज करने से कतराती है। लेकिन न्‍यायालय  के डर से पुलिस साधरण मारपीट का भी केस आईपीसी की धारा 323 के अंतर्गत दर्ज कर लेती है। कानुनी जानकार कहते हैं कि अगर मारपीट की हुई है तो पीडि़त को एफआईआर दर्ज होते ही मेडिकल लीगल सर्टिफिकेट (एमएलसी) ले लेना चाहिए। स्‍थानीय थाने की पुलिस मारपीट की घटना के बाद स्‍थानीय सरकारी अस्‍पताल में पीडि़त का मेडिकल परीक्षण कराती है। अगर किसी दशा में पुलिस मेडिकल नहीं करा रही है तो पीडि़त स्‍वयं भी मेडिकल करा सकता है। एमएलसी ही अदालत में केस को मजबूती प्रदान करती है। आईपीसी की धारा 323 के तहत दर्ज हुए केस पर धारा 334 के मामले को छोड़कर एक साल तक का सश्रम कारावास या एक हजार रूपये जुर्माना या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है। यह एक जमानती, गैर-संज्ञेय अपराध है और कोई भी न्‍यायाधीश मामले पर विचार कर सकता है। इस अपराध में पीडि़त या चोटिल व्‍यक्ति चाहे तो समझौता भी कर सकता है।  
मारपीट के दौरान ही अगर कोई व्‍यक्ति को घातक हथियार से जख्‍मी करता है, तो ऐसी दशा में पुलिस आईपीसी की धारा-324 के तहत मामला दर्ज करती है। जख्‍मी होने पर पुलिस बयान के आधार पर और तहरीर मिलने पर एफआईआर दर्ज करती है। इस दिशा में अगर आरोपी दोषी करार दिया जाता है तो उसे अधिकतम तीन साल की कैद हो सकती है। इस धारा में अगर कोई व्‍यक्ति चाकू घोंपने, गोली चलाने से चोट पहुंचाना, विस्‍फोटक पदार्थ के जरिए शरीर को क्षति होती है तो ऐसी दशा में भी दोषी व्‍यक्ति को तीन साल तक की सश्रम कारावास या जुर्माना या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है। यह अपराध गैर-जमानती है और इसमें समझौता नहीं हो सकता है। यह संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।  
 
 
 
 
 
 
 
 

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