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साँई कम्‍प्‍यूटर टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा म0प्र0 संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565

created May 19th, 04:42 by lucky shrivatri


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कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती में हुई गड़बड़ी के मामले में वहां के स्‍कूल शिक्षा मंत्री परेश अधिकारी को हटाने की सिफारिश की है। अदालत का यह आदेश उनकी पुत्री की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के बाद आया है। हाईकोर्ट ने मंत्री को हटाने के लिए राज्‍यपाल और मुख्‍यमंत्री से सिफारिश की है। साथ ही पूरे मामले की जांच सीबीआइ को सौंप कर मंत्री को सीबीआइ कार्यालय में पूछताछ के लिए पेश होने का आदेश भी दिया है। आरोप है कि मंत्री पुत्री का नाम मेरिट में नहीं था, फिर भी उसे नौकरी मिल गई। यहां तक कि मंत्री पुत्री ने व्‍यक्तित्‍व परीक्षण में हिस्‍सा नही लिया। भर्ती आयोग के पास इस बात का कोई रेकॉर्ड नहीं मिला कि मंत्री पुत्री ने पर्सनालिटी टेस्‍ट में कितने अंक हासिल किए। देश में संभवत: अपनी किस्‍म का यह पहला मामला होगा, जहां हाईकोर्ट ने किसी मंत्री को हटाने के निर्देश दिए हो। यह विडंबना ही है कि भ्रष्‍टाचार के ऐसे मामलों में कार्रवाई करने का जो काम सरकार का होना चाहिए, उसमें कोर्ट को आगे आना पड़ा और मंत्री को हटाने तक की बात कहनी पड़ी। बताया जा रहा है कि सरकार की ओर से इस मामले को नजरअंदाज किया जा रहा था। बाद में कोर्ट को इस मामले में दखल देकर जांच के लिए सीबीआइ को कहना पड़ा। देश में यह एक तरह से धारा चल निकली है कि सरकारें संवेदनशील मामलों में भी राजनीतिक बाध्‍यता के कारण अपने दायित्‍वों से पीछे हट जाती है। बाद में संबंधित पक्षकारों के कोर्ट में शरण लेने पर ऐसे मामले में न्‍यायपालिका को हस्‍तक्षेप करना पड़ता है। लोकतंत्र में सभी स्‍तंभों का अपना महत्‍व है, लेकिन उसका एक पाया कमजोर दिखता है, तो जनता का चिंता होना स्‍वाभाविक है। बाद में जनता को न्‍यायपालिका से ही उम्‍मीद दिखती है। युवाओं के भविष्‍य से जुड़े इस मामले में न्‍यायपालिका की भूमिका सराहनीय ही कही जाएगी। भ्रष्‍टाचार के मामले को लेकर मंत्री को हटाने के लिए कोर्ट को सीधे तौर पर कहना पड़ा, यह वाकई पश्चिम बंगाल सरकार के लिए सोच विचार की बात होनी चाहिए। भ्रष्‍टाचार देश की बड़ी समस्‍या बनता जा रहा है। भ्रष्‍टाचार के समंदर में छोटी से लेकर बड़ी मछलियां तक गोता लगाती दिख रही है। सरकारें राजनीतिक दबा
में कार्रवाई से पीछे हटती नजर आती है। सरकारों को अपनी जिम्‍मेदारी समझनी होगी। अन्‍यथा कोर्ट तो समय-समय पर उनको आईना दिखाता ही रहता है।   

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