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DATE 15/09/2021 TEST FOR MPHC JUNIOR JUDICIAL ASSISTANT BY ACADEMY FOR STENOGRAPHY, MORENA,DIR- BHADORIYA SIR

created Sep 15th, 12:11 by ThakurAnilSinghBhado


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प्रत्‍यर्थी अभियुक्‍त के विद्वान् काउंसेल ने यह निवेदन किया कि प्रत्‍यर्थी अभियुक्‍त के दो भाइयों की मृत्‍यु हो चुकी है और परिवार में केवल वही एक मात्र कमाने वाला व्‍यक्ति है और इसलिए उसके प्रति उदार रुख अपनाया जाना चाहिए। अभियुक्‍त द्वारा निचले न्‍यायालय में फाइल किए गए लिखित कथन से पता चलता है कि गफर नामक उसके एक भाई की मृत्‍यु घटना के घटित होने से पहले ही हो चुकी थी। अभिलेख में यह बात कहीं भी नहीं दर्शाई गई है कि इस्‍माइल नामक उसके एक अन्‍य भाई की मृत्‍यु कब हुई थी। यह बात स्‍पष्‍ट नहीं है कि अभियुक्‍त के परिवार में कितने पुरूष सदस्‍य हैं। ज्‍यादा से ज्‍यादा यह दलील ही दी जा सकती है कि अभियुक्‍त एक गरीब परिवार का है, किंतु इस प्रकार के मामले में न्‍यायालय इसे तो आधार बना सकता है और ही इसे आधार बनाया जाना चाहिए। इस संबंध में डी. पी. सोलंकी बनाम बाई पाली नामक विनिश्‍चय के प्रति निर्देश किया जा सकता है। उस मामले में विद्वान् एकल न्‍यायाधीश ने यह अभिनिर्धारित किया था कि इस तथ्‍य के कारण अभियुक्‍त स्‍त्री अत्‍‍यधिक उदार बर्ताव की हकदार नहीं हो जाती कि वह एक विधवा है और एक गरीब वाहक है। अगर स्‍पष्‍ट रूप से कहा जाए तो अभियुक्‍त जैसे व्‍यक्तियों की मदद करने की तत्‍परता के बिना बड़े तस्‍कर अपने उन घृणित क्रियाकलापों को जारी नहीं रख सकता जिनसे राष्‍ट्र की अर्थ व्‍यवस्‍था और उसकी उन्‍नति खतरे में पड़ जाती है।  अभियुक्‍त के विद्वान् काउन्‍सेल ने यह निवेदन किया है कि उदार रुख अपनाया जाना चाहिए और विद्वान् मुख्‍य न्‍यायिक मजिस्‍ट्रेट द्वारा अभियुक्‍त पर अधिरोपित दंडादेश को कम कर दिया जाए। यह बात दृष्‍टव्‍य है कि प्रत्‍यर्थी अभियुक्‍त ने सेशन न्‍यायालय के समक्ष इस निर्णय और दंडादेश को चुनौती नहीं दी थी। उसने तो केवल यह प्रार्थना की है कि उसे अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 के उपबंधों के अधीन परिवीक्षा अनुदत्‍त की जाए। साधारणतया ऐसी दशा में अभियुक्‍त इस बात की प्रार्थना नहीं कर सकता कि दंडादेश के संबंध में उदार रुख अपनाया जाए।    

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