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सॉंई कम्‍प्‍यूटर टायपिंग इंस्‍टीट्यूट गुलाबरा छिन्‍दवाड़ा म0प्र0 सीपीसीटी न्‍यू बैच प्रारंभ संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नं. 9098909565

created Sep 13th, 13:25 by lovelesh shrivatri


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देश के 130 प्रमुख बांधों में पिछले साल के मुकाबले 16 फिसदी कम पानी आना चिंताजनक तो है हि, खतरे की घंटी से कम भी नहीं माना जा सकता है। ये पहली बार नहीं, जब मानसून की बेरूखी ने संकट बढाया हो। हर दो-तीन साल में कम वर्षा के हालात बनते हैं। पेयजल किल्‍लत को लेकर पांच सितारा होटलों से लेकर संसद-विधानसभाओं में चिंता जाहिर की जाती है लेकिन पानी के संकट से उबरने को लेकर क्‍या सरकारें वाकई चिंतित है? यह सवाल रह-रह कर गूंजता जरूर हैं। देश की 140 करोड़ आबादी के लिए पानी की जरूरतों पर क्‍या गंभीरता से विचार किया गया? विचार किया गया तो क्‍या इससे निपटने की ठोस रणनीति बनाई गई? जवाब है- नहीं। सब जानते हैं कि जल के बिना कुछ नहीं। जल है तो कल हैं का नारा अनेक सरकारी इमारतों और पानी बचाने के लिए चलाए गए अभियानों में तो नजर आता है। लेकिन क्‍या हम जल को बचाना चाहते हैं? नारों में नहीं, बल्कि हकीकत में? मानसून के पूर्वानुमान अनेक बार गलत साबित हो जाते हैं। प्रकृति से हम संघर्ष नहीं कर सकते लेकिन उसके आचरण से कुछ सीख तो ले सकते हैं। दूसरे देशों की जल नीति से कुछ प्रेरणा भी ले सकते हैं। लेकिन इसे दुर्भाग्‍य ही माना जाएगा कि सीख और प्रेरणा लेने के बावजूद हम उस पर अमल करना नहीं सीख पाए हैं। मौसम की मार हर साल कहीं मानसूनी वर्षा से बाढ़, तो कहीं सुखे के रूप में देश की बडी आबादी को आहत कर रही है। बाढ़ से निपटने में भी सरकारें अरबों-खरबों रूपए खर्च करती हैं और सूखे से पार पाने में भी। दशकों से चर्चा चल रही हैं नदियों को जोड़ने की। ताकि बाढ़ से भी बचा जा सके और सूखे से भी। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय नदियों को जोडने की योजना पर काम शुरू हुआ था लेकिन परवान नहीं चढ़ सका। इस मुद्दे पर राजनीति नहीं करने के दावे सभी दल भले ही करते हों लेकिन अंतराज्‍यीय जल विवाद इसकी पोल खोलने के लिए पर्याप्‍त है। सालों तक ये विवाद अदालतों में चलते हैं। जल बंटवारे को लेकर हिंसक झड़पों की खबरें भी आती रही हैं। जरूरत आज पानी की एक-एक बूंद के सरक्षण की है। पानी पैदा नहीं हो सकता, सिर्फ बचाया जा सकता है। इसके बावजूद इस मुद्दे पर जितना काम होना चाहिए, हो नहीं रहा है। जरूरत है कि यह विषय सभी की प्राथमिकता में शीर्ष पर हो। अब भी इस पर ध्‍यान दिया जाए तो अच्‍छा होगा। नए बांधों के निर्माण की योजनाएं भी बनें और नदियों को जोड़ने पर नए सिरे से विचार भी हों।  

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