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HIGH COURT HINDI TYPING PRACTICE SHUBHAM BAXER CHHINDWARA (M.P.) 7987415987

created Sep 13th, 13:05 by shubham baxer


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हम सब जीतना चाहते हैं, विजेता होना चाहते हैं। फिर सब लोग विजेता क्यों नहीं बन पाते। आखिर वह कौन सी लकीर है जो सफलता और असफलता के बीच अंतर उत्पन्न  करती है। यह महीन लकीर है आत्मविश्वास की। दरअसल विजेता बनने की अनवार्य शर्त है आत्म‍-विश्वास। हम अंदर से जितने मजबूत होते हैं, लक्ष्य  के प्रति जितने समर्पित होते हैं, उसका प्रतिफल भी उतना ही मनोनुकूल और मधुर होता है। कहा जाता है कि आधी लड़ाई हम मन में ही लड़ते हैं और मन में जीत की सुगंध जाने भर से आगे की राह सुगम हो जाती है। विजेता वही होता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारता और विपरीत परिस्थितियों में वही अपने पथ से नहीं डिगता जिसे खुद पर भरोसा रहा हो। इतिहास ऐसे विजेताओ के उदाहरणों से भरा पडा है कि जिसने भी खुद पर भरोसा किया,आगे चलकर पूरी दुनिया ने उस पर भरोसा किया। एक बच्चा जो चार वर्ष की उम्र तक बोल नहीं पाता था ओर जिसने सात वर्ष तक पढ़ना भी नहीं सीखा था, उस पर किसने विश्वास किया होगा कि यह अयोग्य समझा जाने वाला बालक आगे जाकर सापेक्षता का सिद्धांत देगा। हां, ये आइंस्टीन ही थे। महात्मा गांधी, विस्टन चर्चिल, मोहम्मद अली, स्पीलबर्ग जैसे अनेक उदाहरण हैं जिन्हें अपने शुरूआती जीवन में भयानक पराजय झेलनी पडी, जिनका उपहास उड़ाया गया, लेकिन उन्होंने खुद पर भरोसा बनाए रखा और जो आज मानव समुदाय के लिए अनुकरणीय है। स्वयं पर भरोसा ही सफलता की कुंजी है, क्योंकि यह किसी भी प्रकार के भय को हावी नहीं होने देता और सफलता अवश्य लाती है। खुद पर भरोसा करना तो सोलह आने सही बात है, लेकिन आज के युग में दूसरों पर भरोसा करना आमतौर पर नुकसानदायक सिद्ध होता है। इस बारे में पूछने पर एक संत अपने चेले से कह रहे थे कि आज का युग ठगों का युग है, यहां सभी ठग हैं, किसी पर भरोसा करना। चेले ने पुन: पूछा कि जब संसार में सभी ठग हैं तो कौन किसको ठगेगा। संत ने उत्तर दिया कि जो भी दूसरों पर भरोसा करेगा वही ठगा जाएगा।

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