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created Sep 16th, 02:01 by shilpa ghorke


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एक राज्‍य में अतुलबल पराक्रमी राजा नन्‍द राज्‍य करता था। उसकी वीरता चारों दिशाओं में प्रसिद्ध थी। आसपास के सब राजा उसकी वंन्‍दना करते थे। उसका राज्‍य समुद्र-तट तक फैला हुआ था। उसका मन्‍त्री वररुचि भी बड़ा विद्वान  और सब शास्‍त्रों में पारंगत था। उसकी पत्‍नी का स्‍वभाव बड़ा तीखा था। एक दिन वह प्रणय-कलह में ही ऐसी रुठ गई कि अनेक प्रकार से मनाने पर भी मानी। तब, वररुचि ने उससे पूछा प्रिये तेरी प्रसन्‍नता के लिये मैं सब कुछ करने को तैयार हूं। जो तू आदेश करेगी, वही करुंगा। पत्‍नी ने कहा अच्‍छी बात है। मेरा आदेश है कि तू अपना सिर मुंडाकर मेरे पैरों पर गिरकर मुझे मना, तब मैं मानूंगी। वररुचि ने वैसा ही किया। तब वह प्रसन्‍न हो गई। उसी दिन राजा नन्द की स्‍त्री भी रुठ गई। नन्‍द ने भी कहा प्रिये तेरी अप्रसन्‍नता मेरी मृत्‍यु है। तेरी प्रसन्‍नता के लिये मैं सब कुछ करने के लिये तैयार हूं। तू आदेश कर, मैं उसका पालन करुंगा। नन्न्‍द पत्‍नी बोली मैं चाहती हूं कि तेरे मुख में लगाम डालकर तुझपर सवार हो जाऊं, और तू घोडे़ की तरह हिनहिनाता हुआ दौडे़। अपनी इस इच्‍छा के पूरी होने पर ही मैं प्रसन्‍न होऊंगी। राजा ने भी उसकी इच्‍छा पूरी कर दी। दूसरे दिन सुबह राज-दरबार में जब वररुचि आया तो राजा ने पूछा मन्‍त्री किस पुपूण्‍यकाल में तूने अपना सिर मुंडाया है?  वररुचि ने उत्‍तर दिया राजन मैंने उस पुण्‍य काल में सिर मुंडाया है, जिस काल में पुरुष मुख में लगाम डालकर हिनहिनाते हुए दौड़ते हैं। राजा यह सुनकर बड़ा लज्जित हुआ
 
 
 

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