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गुगल से बतकही और बनावटी सुकून

created May 17th, 11:55 by soni51253


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गूगल अब हूबहू आदमी की तरह बात कर पाएगा। सगी-सहेलियों के लिए यह कोई अच्छी खबर नहीं। उनके लिए तो प्यार के दो बोल ही शाश्वत हैं। क्या ही अच्छा होता यदि गूगल वन-टू-वन बातचीत भी कर पाता। यह मानने में क्या हर्ज है कि ऐसा दिन जरूर आएगा। जब वह बाकायदा इसकी उससे लगाई-बुझाई भी कर पाएगा। तन की हो या मन की, बात सुनने-सुनाने के लिए श्रोताओं का टोटा पड़ेगा और वक्ताओं की किल्लत। सबसे बड़ी बात यह होगी कि इस बातूनी एप के चलते अकेले पड़ते जा रहे बड़े-बुजूर्गों के दिन फिर जाएंगे। बतरस के लालचियों को तब इधर-उधर मारे–मारे फिरना होगा। उन्हें किसी वंशीधर की मुरली छिपाने का स्वांग रचना पड़ेगा और किसी सूने पार्क की बेंच पर बैठ अपनी छड़ी या हवाओं से काना-बाती करनी पड़ेगी। उन्हें दो शब्दों के बदले हर ऐरे-गैरे की चापलूसी नहीं करनी होगी। वे अपने सुनहरे अतीत की तमाम हाहाकारी यादों को बिना शरमाए शेयर कर सकेंगे। अपने जीवन से जुड़ी शौर्य-गाथाओं का पुनर्पाठ कर सकेंगे। एक समय था, जब हर सच्ची खबर के लिए सात समंदर पार लंदन से आने वाली रेडियो ध्वनियों पर कान धरने पड़ते थे। अब अफवाह  को सच जैसा दिखाने के लिये या तो नासा का हवाला देना पड़ता है। या नास्त्रेदमस का संदर्भ। यह विज्ञान और अज्ञान का अद्भूत संधिस्थल है। अब हर तरह की सूचना खुद-ब-खुद बेताल की तरह गूगल की डाल पर लटकती है। मैं तो कहता हूं कि गूगल बुद्धिमत्ता की अधजल गगरी है। मामूली सी बातें यहां से सनसनीखेज खबर बनकर निकलती रहती है। गूगल के गोदाम में यदि ताला जड़ दिया जाए तो दुनिया के कई विचारवीर धाराशायी हो जाएंगे। असलियत की दुनिया बड़ी बेढंगी और बैरंग हो चली है। उसकी ऊसर जमीन से कोई फूल खिलता है, खुशी की बहुरंगी तितलियां फड़फड़ाती हैं। लेकिन इतना तो है कि तकनीक से उपजी भावनाएं कभी फरेब नहीं करती। वे वही करती हैं, जिनके लिए उन्हें बनाया गया है। तकनीक  की दया कभी झूठी नहीं होती।   

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