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BUDDHA ACADEMY TIKAMGARH (MP) || ☺ || ༺•|✤आपकी सफलता हमारा ध्‍येय✤|•༻

created Mar 28th, 04:49 by Anuj Gupta 1610


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हमारे देश में वर्तमान युग में कुछ वर्ग के व्‍यक्तियों को गया गुजरा और जिन क्षेत्रों में वे रहते हैं उन्‍हें गए गुजरे क्षेत्र समझा जाता है। वे लोग हैं वन क्षेत्रवासी कृषि क्षेत्रवासी तथा श्रम क्षेत्रवासी नगरीय क्षेत्र के रहने वाले सुविधा संपन्‍न एवं संपत्तिवान कथित अग्र‍णी लोगाें उपेक्षा और तिरस्‍कार का पात्र समझते हैं। कुछ उन्‍हें दीन हीन कहकर उन पर दया भी दिखते हैं। विवकपूर्वक समीक्षा करें तो कथित सुविधासंपन्‍न और संपत्तिवानों की सुविधा और संपदा और उन गए गुजरे क्षेत्रों के अनुदान ऊपर ही टिकी है। वनों के वृक्षों औश्र वनस्‍पतियों से उत्‍पाद, खनिज उत्‍पाद, किसान के कृषि उत्‍पाद या श्रमशील शिल्पिओं के शिल्‍प उत्‍पाद ही तो कथित सभ्‍य समाज की सुविधा और संपदाओं के आधार हैं, लेकिन विडंबना का घर है। वे हजारों वर्षां से उस संपदा को सुरक्षित रखते हुए अपना जीवन यापन कर रहे हैं। उन्‍हें असभ्‍य असंस्‍कृत कहकर तिरस्‍कृत किया जाात है। जिन  शहरी, नागरीय लोगों ने अपनी सुविधा और संपदा के लिए वन संपदा को तहस नहस कर दिया है उन्‍हें सभ्‍य, सुसंस्‍कृत, सम्‍मानीय माना जाता है। भूमि की उर्वरा शक्ति का उपयोग करके अन्‍य संपदा पैदा करने वाले कृषक को असभ्‍य, मूर्ख, उपेक्षणीय समझा जाता और जो उसी संपदा को किंचित रूपांतरिक करके अनापशनाप मुनाफा कमाता, लोगों को ठगता, व्‍यसन फैलाता है उसे सभ्‍य और समझदार, सम्‍मानीय माना जाता है। यह परिपाटी समझ से परे है। इसे व्‍यवसायिक कुशलता को सम्‍मानित करके उसे उचित मूल्‍य देने की व्‍यवस्‍था क्‍यों नहीं बनाता, उत्‍पादक को भी व्‍यवसाय का साझीदार मानकर उस कमाई का अंश देने में क्‍या हर्ज होता है, यह विचारणीय बिंदु है। विवेक की दृष्टि से तो वह साझीदार है ही, उसे उसका भाग मिलना ही चाहिए। ऐसा करने से उत्‍पादन और व्‍यवसाय का संतुलन बना रहेगा। इससे व्‍यसन में लगने वाला धन कुपोषण दूर कने में लग जाएगा। जिनके व्‍यसन घटेंगे वे भी फायदे में रहेंगे ओर जिनका कुपोषण घटेगा वे भी लाभ में रहेंगे। दोनों प्रकार से समाज का हित साधन होगा। लेकिन यह व्‍यवस्‍था क्‍यों नहीं हो पाती, इसके लिए विचार किया जाना चाहिए। आज के युग में अपने लिए सुख सुविधाएं जुटाने वाले व्‍यक्ति को श्रेष्‍ठ और सम्‍मानीय माना जाता है यह सोच अवैज्ञानिक है। विज्ञान के अनुसार उसी मशीन को श्रेष्‍ठ माना जाता है जो कम इनपुट या साधन लें और अधिक आउटपुट या परिणाम दें। उसकी एफिशिएंसी यानी दक्षता इसी आधार पर नापी जाती है। मशीन की तरह मनुष्‍य की दक्षता का भी यह फैसला होना चाहिए। मनुष्‍य को अपनी आवश्‍यकता कम से कम पूरी करके अधिक से अधिक पर परमार्थ प्रयोजनों में लगा देने वाली उच्‍च दक्षता वाला जीवन अपनाना चाहिए।

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