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बंसोड टायपिंग इन्‍स्‍टीट्यूट शॉप नं. 42 आनंद हॉस्टिपटल के सामने, संचालक- सचिन बंसोड मो.नं.

created Feb 22nd, 01:10 by sachin bansod


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आतंकवाद के वित्‍त पोषण पर निगाह रखने वाली अंतरराष्‍ट्रीय संस्‍था फाइनेंशियल एक्शन टास्‍क फोर्स यानी एफएटीएफ ने पाकिस्‍तान को जिस तरह एक बार फिर ग्रे लिस्‍ट में रखने का फैसला किया उसका मतलब यही है कि उसकी चालबाजी काम नहीं आई। इसमें कहीं कोई संदेह नहीं कि पाकिस्‍तान ने हाल में आतंकवाद के खिलाफ जो कदम उठाए थे वे विश्‍व समुदाय की आंखों में धूल झोंकने के लिए ही थे। यह संतोषजनक है कि एफएटीएफ उसके झांसे में नहीं आया, लेकिन उसकी ओर से उसे बार-बार मोहलत देना भी कोई शुभ संकेत नहीं। पाकिस्‍तान कई बार चेतावनी देने के बाद भी जिस तरह इस संस्‍था के निर्देशों का पालन करने में हीलाहवाली कर रहा है उससे यदि कुछ स्‍पष्‍ट होता है तो यही कि वह आतंकवाद का रास्‍ता छोड़ने के लिए तैयार नहीं। इसके एक नहीं अनेक प्रमाण भी हैं। बतौर उदाहरण, हाल में आतंकी सरगना हाफिज सईद को भले ही आतंकवाद के दो मामलों में सजा सुना दी गई हो, लेकिन एक अन्‍य आतंकी सरगना मसूद अजहर के बारे में दुनिया को यह बताया गया कि वह लापता हो गया है। इसी तरह उसकी सेना के संरक्षण में पल रहे आतंकी दाऊद इब्राहिम के बारे में बार-बार यह झूठ दोहराया जाता है कि वह तो पाकिस्‍तान में है ही नहीं। यह ठीक है कि एफएटीएफ में चीन ने पाकिस्‍तान का साथ नहीं दिया, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वह यह भी कह रहा है कि पाकिस्‍तानी सरकार आतंकवाद पर काबू पाने के लिए बहुत कुछ कर रही है। स्‍पष्‍ट है कि चार माह बाद जब एफएटीएफ की अगली बैठक होगी तो भारत को इसके लिए सतर्क रहना होगा कि पाकिस्‍तान को तो कोई राहत मिले और ही मोहलत। भारत को उन कारणों की तह तक भी जाना चाहिए जिनके चलते पाकिस्‍तान को बार-बार मोहलत मिल जा रही है। भारत को पाकिस्‍तान की ओर से आतंकवाद को खाद-पानी देने के तौर-तरीकों का पर्दाफाश करने के साथ ही इसकी भी चिंता करनी होगी कि वह कश्‍मीर में दखलंदाजी करने से बाज क्‍यों नहीं रहा है? सीमा पर संघर्ष विराम उल्‍लंघन के मामले और साथ ही आतंकियों की घुसपैठ की कोशिश यही बताती है कि पाकिस्‍तान भारत विरोधी हरकतें छोड़ने के लिए तैयार नहीं। चूंकि अमेरिका अफगानिस्‍तान से निकलने के लिए आतुर है इसलिए भारत को इसकी भी चिंता करनी होगी कि कहीं वहां के हालात और खराब हो जाएं? यदि ऐसा होता है तो इससे भारत की सुरक्षा के लिए खतरा और अधिक बढ़ सकता है। इस खतरे के संदर्भ में भारत की यात्रा पर रहे अमेरिकी राष्‍ट्रपति से बातचीत होनी ही चाहिए।

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