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हड़ताल upp computer operator (To join group msg me 9044095689)

created Nov 24th 2017, 08:30 by Ankur Sachan


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पंजाब सरकार ने बार-बार हड़ताल पर जाकर सरकारी कार्यों को बाधित प्रभावित करने वाले कर्मचारियों पर शिकंजा कस दिया है। सरकार ने ऐसे सभी कर्मचारियों उनके नेताओं की विभागों से सूची मांगी है जो अपनी मांगों को लेकर अक्सर कामकाज छोड़कर हड़ताल पर चले जाते हैं। बेशक सरकार का यह फैसला कुछ संगठनों या इन संगठनों से जुड़े नेताओं को रास नहीं आएगा और उन्हें यह उनके संवैधानिक अधिकारों पर कुठाराघात प्रतीत होगा परंतु आमजन के लिए सरकार का यह कदम राहतभरा है। कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से जो आमजन को परेशानी होती है उससे उन्हें काफी हद तक राहत मिलेगी। अपना हक मांगना या फिर हक के लिए लडऩे का सभी को अधिकार है परंतु उसका मतलब यह नहीं है कि उस लड़ाई के चक्कर में आम जनता को परेशानी झेलनी पड़ी और सरकारी कार्य भी प्रभावित हों। अपनी मांगों को सरकार से मनवाने के लिए बहुत से ऐसे तरीके अपनाए जा सकते हैं जिससे तो लोगों को परेशानी होगी और सरकार भी कर्मचारियों की मांगों पर विचार करने के लिए मजबूर हो जाएगी। गांधीगीरी से आमजन को अपने साथ जोड़कर सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है। इससे जनसेवा भी होगी और आमजन का सहयोग मिलने से सरकार कर्मचारियों की जायज मांगें मानने पर मजबूर भी होगी, लेकिन हमारे यहां कुछ विभागों में तो ऐसे कर्मचारी नेता हैं जो दफ्तरों में अपनी सीट पर ही कभी कभार नजर आते हैं। अपना काम दूसरों पर डालकर दफ्तर से गायब रहने वाले ये नेता अक्सर किसी किसी संगठन की हड़ताल में शामिल होने चले जाते हैं। इन नेताओं की दहशत भी इतनी है कि अपने संगठन के दम पर ये अधिकारियों को तो धमकाते ही हैं साथ ही अपने कनिष्ठों या मातहत कर्मचारियों पर भी पूरा दबाव बनाकर रखते हैं। ऐसा नहीं है कि ये अपने संगठन के दम पर ही यह सब करते हैं, बल्कि वोट बैंक की राजनीति के चलते इनपर राजनीतिक आकाओं का भी वरदहस्त रहता है। कार्यालयों में कर्मचारियों की हड़तालों से किसी का भला नहीं होता है बल्कि उल्टा काम बाधित होने के साथ-साथ आमजन को परेशानी होती है। हड़ताल के दौरान कर्मचारी सड़कों हाईवे तक को जाम कर देते हैं जिससे मरीजों किसी जरूरी कार्य के लिए घर से निकले लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। सरकार के इस फैसले को कर्मचारी संगठनों को भी अन्यथा लेकर इसपर मंथन करना चाहिए और अपने हक की लड़ाई के लिए सड़कों को जाम करने के बजाय ऐसी मिसाल कायम करनी चाहिए जिससे आमजन तो उनके साथ जुड़े ही, साथ ही सरकार भी उनके अनुकरणीय कार्यों से प्रभावित हुए बिना रह सके। बिहार सरकार के पूर्व स्वास्थ्यमंत्री एवं लालू प्रसाद के ज्येष्ठ पुत्र तेजप्रताप यादव ने उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के प्रति जिस अभद्र भाषा में टिप्पणियां की, वह सिर्फ आपराधिक दायरे में आती है बल्कि स्वस्थ राजनीतिक परंपराओं पर गहरा आघात भी है। उप मुख्यमंत्री ने अपने बेटे की शादी का निमंत्रण लालू परिवार को भेजा था जिस पर आपा खोकर तेजप्रताप ने सारी मर्यादाएं भंग करके शादी समारोह में उपद्रव और मारपीट करने की धमकी दे डाली। तेजप्रताप की मोदी के प्रति गुस्से की वजह समझी जा सकती है यद्यपि इसकी अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने अनुचित अवसर और बेहद अनुचित तरीका अख्तियार किया।  

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